बिनब्याही माँ भाग 5
बिनब्याही माँ भाग 5

सम्मोहन के आभा मण्डल से निकल कर रश्मि अब समर्पण की कंटिली पगदंडी पर चल पड़ी थी! कब्बडी का मैदान हो या बैडमिंटन का कोर्ट दोनों एक-दूसरे से बतियातें-मुस्कुरातें नज़र आतें! जेसीका दो-तीन बार उससे शिकायत भी कर चुकी थी....यारा! चार दिन अस्पताल में भर्ती क्या हुई, तुमने तो अपनी पुरानी वाली का दामन झटक कर नया हमराह भी चुन लिया...भूल गई इस रंगीली कुड़ी को... और दोनों खिलखिला कर हँस पडती!
कॉलेज का कैंटीन, विस्तीर्ण फैला बोटोनिकल  गार्डन, आसपास के खेत-खलिहान, कृष्णा-कोयना का मंदिरों से सुशोभित रमनीय घाट उनका प्रिय मिलन-स्थल बन चूका था! रश्मि अब एक साहित्यिक मंच से भी जुड़ चुकी थी जिसमें कॉलेज के तीनों विभागों के विद्यार्थी शामिल थे!
कभी वाद-विवाद स्पर्धा के बहाने तो कभी विचार-विमर्श के बहाने वो एक-दूजे से मिलते रहते!
जैसे-जैसे वो एक-दूजे के करीब आते गए, जीवन-किताब की परते खुलती गई!
शौर्य जम्मू का रहने वाला था! मुखबिरी के शक में उसके पिता की माँ-बेटे की आँखों के सामने ही हत्या कर दी गई थी! छोटा भाई जैसे ही माँ को लिपट कर रोने लगा, दरिंदो ने उस पर भी गोलियाँ चलाई और पलभर में कायर दरिंदे जंगलों में घुस कर रफूचक्कर हो गएं!  शौर्य इसलिए बच गया था कि वह माँ के कहने पर अपने सेब के बागान से ताजे सेब लाने गया था! जैसे ही सेब से भरी टोकरी लेकर वह घर लौटा....आँगन का नजारा देख बिलख पड़ा!
खून से लथपथ दो लाशों के बिच फूट-फूट कर रोती माँ, अस्त-व्यस्त बिखरे लाल-लाल सेब और दर्शक बन खड़ी भीड़ के बिच माँ से लिपट कर जोर-जोर से रोता एक असहाय किशोर... आज भी लाख कोशिशों के बाद भी भूल नहीं पाया था शौर्य वह डरावना मंजर!
रश्मि की आँखें नम हो गई! कितनी पीड़ उबल रही थी इस ज्वालामुखी के अंतस में! असीम क्षोभ का दर्या उफन रहा था सीने में पर पेशानी पर न कोई सलवट न होठों पर कटु शब्द! जब देखो तब अपनी मोतियों सी पानीदार दन्तपंक्ति की नुमाइश करता रहता था वह दिलफेंक बन्दा!
कृष्णा-कोयना की बहती चंचल धारा में पैर रख कर सुकून से बैठे थे वे दोनों... आसपास के मंदिरों की घंटियों का मधुर नाद उन्हें स्वर्गीय सुख का आनन्द दे रहा था! रश्मि ने होले से शौर्य का हाथ अपने हाथ में लेकर प्यार से दबाया मानों वह आश्वस्त करना चाह रही थी... "मैं हूँ न! तुम्हारे दुःख-सुख की साथी"..
पूनम का चन्द्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहा था और वह युगल जोड़ी अभिभूत हो कर उसमें नहा रही थी! दोनों एक-दूजे का हाथ थाम कर खड़े हुएं और पास में खड़ी बाइक की ऒर बढ़ने लगे...
शौर्य अब तक संभल चूका था.. रश्मि का साथ उसके लिए बहुत मायने रखता था!  गाँव के एक बुजुर्ग दंपत्ति के 'वाड़े' में वह बतौर पेइंग गेस्ट रह रहा था! बुजुर्ग दंपत्ति के दोनों बच्चे विदेश में पढ़ते-पढ़ते वहीं बस गए थे! तन्हाईयों में उन्हें शौर्य में अपने बेटे की छवि नज़र आती थी ...
इलाके की सुप्रसिद्ध राजनेत्री की सिफारिश पर ही उन्होंने शौर्य को रहने की जगह दी थी! पुरे क्षेत्र के विकास का जिम्मा उसी नेत्री पर था और वह भी अपनी जिम्मेदारी को दिलोंजान से निभाती थी! वह ममतामई राजनेत्री, जो क्षेत्र के लोगों के दिलों पर राज करती थी वही उसे यहाँ ले आई थी... उसकी माँ को बच्चे के उज्जवल भविष्य का भरोसा दे कर!
रश्मि को घर के बाहर छोड़ वह अपने गंतव्य की ऒर निकल पड़ा.. फिर मिलने का वादा कर...
रश्मि के घर की देहरी पर और तुलसी वृन्दावन में मिट्टी के दीयें जल रहें थे और माँ वहीं सीढ़ियों पर बैठी थी..
रात अपना जलवा बिखेर चुकी थी और रश्मि का चेहरा दीये की लौ में दमक रहा था! वह अधीर सी बच्ची की तरह माँ से लिपट गई ..."अब तक इंतज़ार कर रही थी माँ... खाना भी नहीं खाया न ...." कहकर वह गुसलखाने की तरफ बढ़ गई...वह जानती थी माँ शब्दों की तोफ से आग उगलते गोलों से कई सवाल एक साथ दागेगी...

 

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

शेष अगले भाग में...

 

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