बच्चे!
बच्चे!
बच्चे हम छोटे ही अच्छे।
खेलें पहन बनियान-कच्छे।
बड़ों की दुनिया है भारी।
डरावनी बहुत कारी-कारी।

फूल-परिंदे देख मुस्काते।
कभी नहीं हम काँटे बोते।
हिलमिल सबसे नयन मिलाते।
खेलकूद में दिवस बिताते।।

मन का हर कोना निर्मल।
आँखों में दरया का जल।
औरों की आँखों में देख पानी।
नन्हा मन होता पानी-पानी।।

खेल-खिलौने, हंसी-ठहाके,
मस्ती की कक्षा में हम चहके।
तोता-मैना, शेरू-म्याऊ प्यारे,
सखा-सहेली साथी न्यारे।।

नाचो-गाओ मौज मनाओ।
बिस्किट-चॉकलेट जी भर खाओ।
रंग-बिरंगी तितली-पर मत छूना।
फूलों संग कर खुशियों को दूना।।

स्वार्थ-मोह, ईर्षा-द्वेष भरी,
मासूम परिंदे! उठा मत गठरी।
बड़ों की दुनिया से कर किनारा।
क्षितिज पर लिखेंगे नाम हमारा।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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