सिर्फ तुम्हारे लिए...
 सिर्फ तुम्हारे लिए...

शीर्षक : सिर्फ तुम्हारे लिए...

लोकतंत्र की देवी! सिर्फ तुम्हारे लिए... कल कितने पापड़ बेले हमने पता हैं तुम्हें? सिर्फ तुम्हारे लिए!
'पहले मतदान, फिर जलपान' बार-बार कानों में विज्ञापन की पंक्तियाँ गूंज रही थी लेकिन क्या करें... सुबह-सुबह बिना चाय की प्याली को होठों को लगाए दिन की शुरुआत ही कहाँ होती है? बिना पेट्रोल, डिझल के कोईं गाड़ी चलती है भला?परिवार के अन्य सदस्य सुबह के सपने देख रहे थे और मैं फटाफट निकल गई वोटिंग के लिए.. हॉं! आधार कार्ड जरूर साथ लिया था! सोचा! हर चुनाव में वोटिंग किया है, लिस्ट में नाम होगा ही और चल पड़ी नजदीकी स्कूल में जहाँ पिछली बार वोटिंग किया था!
सूरज ने अपनी मुस्कान बिखेर दी थी और मंद-मंद चल रही हवाएं लटों से उलझ रही थी!
मैं कतार में खड़ी हो गई तभी पास खड़ी लड़की नें कहा, ' आंटी! वरिष्ठ नागरिकों के लिए आगे अलग से लाइन है.. आप वहाँ चली जाएँ.. मैं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गई और पास खड़े युवा का सहारा लेकर सीढ़िया चढ़ने लगी!
पुलिस, चुनाव संयोजकों की अच्छी खासी तादाद आम जनता की सेवा में लगी थी! अब वोटर लिस्ट में नाम ढूंढ़ने का टेड़ा काम शुरू हो चूका था! आधे घंटे में वोटिंग कर घर लौटने का मेरा सपना कब का फुर्र हो चूका था! मैं बार-बार वोटिंग करने देने की गुहार लगा रही थी और वो सभी मेरी उम्र और सफ़ेद बालों को देख मुझे पूरा सहयोग दे रहे थे मगर अन्त में वो भी थक गये!
मेरा जुनून इतनी जल्दी ख़त्म होने वाला नहीं था! मैंने पुराने वोटिंग कार्ड भी दिखाए लेकिन वहीं ढ़ाक के तीन पत्ते! अन्त में वो भी थक गये और मुझे कुर्सी पर बैठा कर अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश करने लगे!
मैं हार मानने को तैयार नहीं थी.. मैंने फिर एड़ी-चोटी का जोर लगाया और मैं उन्हें विनती कर खुद ही वोटर लिस्ट में अपना नाम ढूंढ़ने लगी! तभी क़ज़रारे बादलों के बिच एक रूपहली लकीर दिखाई दी! मेरे बेटे का नाम लिस्ट में दिखाई दिया! इतनी जद्दोजहद के बाद मिली छोटी सी कामयाबी नें मानो मेरा हौसला ही बढ़ा दिया! वो भी समझ गये कि ऑन्टी जी की बात सही है.. शायद दूसरे केंद्र में तो नहीं आये हैं बाकि नाम?
उन्होंने आस-पास के केंद्र के नाम बताएँ और मैं दूसरे केंद्र की तरफ चल पड़ी!
बाहर खड़ी पुलिस के एक सिपाई को मैंने पूछा ," भाऊ! इथे टेबल कुठे आहे मतदात्यांची माहिती देणारं ? "
पुलिस ने सामने लगी कतार की ऒर इशारा किया! अब तक मैं जान चुकी थी कि यह धैर्य का काम है.. मुझे पहले केंद्र का पता और लिस्ट में नाम ढूँढना होगा! एक पूर्व खिलाडीन होने के नाते इतनी जल्दी मैदान छोड़ कर भागना मेरी फितरत नहीं थी! मैं डटी रही और अन्त में मेहनत रंग लाई! लगे हाथ मैंने परिवार के सभी सदस्यों के केंद्र और क्रमांक प्राप्त किए... वहाँ सहयोग कर रहे मेहनती कार्यकर्ताओं से सारी जानकारी ले मेरे परिजनों को व्हाट्सअप्प कर दी ताकि उन्हें वोटिंग में परेशानी न हो!
पल भर के लिए ऐसे लगा मानो मैंने एक बड़ी जंग जीत ली है और अब कुछ ही पल में नीली स्याही से रंगी उंगली के साथ मुस्कुराता चेहरा फेसबुक, एक्स पर पोस्ट करना ही बाकि है!
मेरा, मेरे पति और बहूँ का नाम एक केंद्र में आया था! हम वरिष्ठ नागरिकों की कतार में लग गये और बहूँ बाहर लम्बी कतार में!
पास में लगे बाकड़े पर सभी वरिष्ठ नागरिक बैठें थे अपने क्रमांक पर मतदान करने के लिए और युवा खड़े थे! पंखा था लेकिन वो सिर्फ चुनाव अधिकारीयों के लिए और पानी की इक्का-दुक्का बोतल पुलिसकर्मी लाकर दे रहे थे एकाध बुजुर्ग की विनती पर! कोईं हाय-हेलो कर रहा था तो कोईं अपनी कहानी सुना रहा था! पुलिसकर्मियों का भी मानवीय चेहरा दृष्टीगत हो रहा था! अब सूरज आग बबूला हो गया था और पेट में चूहें दौड़ रहे थे! पांच-छ: व्यक्ति ही आगे थे और हम खुद की जिद्द, जुनून पर इतरा रहे थे तभी अंदर से आवाज़ आने लगी! दरवाजे से झाँक रहे युवाओं नें एलान कर दिया कि वोटिंग मशीन बंद पड़ गई हैं और कर्मचारी उसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं! अब लोगों में झाँकने की और नई-नई कहानियाँ कहने की होड़ सी लग गई! कई सुझाव तो बिनमांगे आ गये!
"कितना चंगा होता, वोटिंग ऑनलाइन होता... दूसरा बोल पड़ा," की कहांदा हैं तू.. इंडिया में..." अब मेरे पास बैठी आंटी जो जवानी में शिक्षिका की नौकरी कर चुकी थी और चुनाव अधिकारी के तौर काम कर चुकी थी, बोल पड़ी!
" ए लोग तो बेचारे सुबह छ: बजे से आकर बैठे हैं.. उन्होंनें नाश्ता भी किया या नहीं पता नहीं! " सभी कुछ पल के लिए खामोश हो उनकी पीड़ा को भी महसूस करने लगे! अंदर वोटिंग मशीन को ठीक करने में लगे लोग अब थक चुके थे! असफलता उनके हाथ लगी थी और विचार-विमर्श कर उन्होंने अपने अधिकारी को सूचित किया! अब तक घड़ी के कांटे पूरा चक्कर लगा कर आगे बढ़ चुके थे और कुछ साहसी युवा पानी की बोतलें और केले लेकर पहुँच गये थे! सभी बुजुर्गों को उन्होंने बारी-बारी से पूछा! मई की तपिश, गर्म हवा नें सबको परेशान कर दिया था! तभी अंदर से महिला बाहर आई और उसने कहा, " अभी एक घंटा और लगेगा.. मशीन विद्याविहार से यहाँ पवई तक पहुँचने में एक घंटा कम से कम लगेगा! आप चाहो तो मेरे पास नाम लिखा कर घर जा सकते हो..बिना लाइन के आपको ले लेंगे!" कोईं वहाँ से हिलने को तैयार नहीं था! सब एक आवाज़ में बोल पड़े, " हम तो वोटिंग कर कर ही जाएंगे... एक बार
घर गये तो फिर नहीं आएंगे!"
बुजुर्गों का धैर्य अभी कायम था..कहीं-कहीं तो युवाओं से भी ज्यादा! सभी के इरादे बुलंद थे!
अब युवा भी कतार में मोबाइल हाथ में लेकर पालती मार नीचे बैठ गये मानो पिकनिक मना रहे हो! कोईं मोबइल पर गेम खेलने में व्यस्त हो गया तो कोईं परिजनों से बातें करने!
अब तक पवई में वोटिंग मशीन ख़राब होने की खबर आग सी फ़ैल चुकी थी और कतार ने खुद को दूर तक विस्तारित कर दिया था!
किसी ने चुनाव के पोस्टर को नीचे बिछा दिया था तो कोई पास पड़े गद्दे को खोलकर उस पर महफ़िल जमा बैठे थे!
मुंबईकारों का यहीं जज्बा मुझे बहुत भाता हैं! कांटों पर भी दिल खोल कर मुस्कुराना इन्हें आता हैं! जिन्हें पत्थरदिल कहती हैं दुनिया, वो विपरीत परिस्थितियों का सामना बड़ी हिम्मत और धैर्य से करते हैं!
तभी जोरदार तालियों की गूंज सुनाई दी.. "मशीन आ गई.." बूढ़े दादा बोल पड़े! यह समस्या के निराकरण की पहली सीढ़ी थी! अभी पूरा सेटअप करेंगे, टेस्टिंग होंगी और फिर शुरू होगी थमी हुई वोटिंग!
उम्मीद के सहारे वक़्त जल्दी कट गया.. और अन्त में फिर पर्चीयां देना शुरू हो गया! मानो घंटों की तपस्या सफल होने को थी! अब मौके का फायदा उठानेवाले भी कहाँ कम थे यहाँ! दो-चार बुजुर्ग भी आगे कतार में घुस चुके थे लेकिन सभी सतर्क थे! कोई किसी को रियायत देने के मूड में नहीं था! सभी नें विरोध कर उन्हें पुलिस की मदद से पीछे भेज दिया था!
मेरी बारी आई तभी एक ऑफिसर एक महिला को लेकर अंदर आया! "इन्हें चक्कर आ रही हैं.. इन्हें कुसी दो और इनका मतदान पहले करा दो!"
पसीने से तर्र महिला को मैंने आगे जगह दी! अब मेरा क्रमांक था.. पर्ची बन चुकी थी और नीली स्याही का इंतज़ार था! बस! अभियान सफल होने में चंद मिनिट बाकि थे! जैसी ही मैंने नीला बटन दबाया, मुझे लगा मानो एवेरेस्ट फतह कर लिया हैं मैंने! बाहर खड़े कैमरा वालों से बात कर मैं पतिदेव के साथ गाड़ी में बैठ घर की ऒर प्रस्थान कर चुकी थी! गैस पर दूधवाले से सबेरे लेकर रख्खा हुआ दूध मेरा इंतज़ार करते-करते फट चूका था और मैं आज घर में कलाकंद बनेगा इस कल्पना से मैं फूले नहीं समा रही थी..
लोकतंत्र का उत्सव हैं भाई! क्यों न कुछ मीठा हो जाएँ...लोकतंत्र की देवी! सिर्फ तुम्हारे लिए....

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र

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