गुब्बारेवाली!
गुब्बारेवाली!
सूर्य अस्ताचल की ओर प्रस्थान कर रहा था! लॉक डाउन बढ़ने की खबर के साथ ही मन उद्विग्न हो गया! सुनसान मुम्बई को देखने की आदत नहीं थी न कभी! न शोर न शराबा, न हलचल न बाजारों में रौनक! कहाँ से आया यह मनहूस कोरोना? मुम्बई की धमनियों में बहते खून की जगह मानो खून के थक्के जमा हो गए थे! सड़क से बेस्ट की विज्ञापन से लदी बसें गायब, पटरियों पर दौड़ती लोकल ट्रेन ठप्प! इक्का-दुक्का रिक्शा, टैक्सी थी वो भी मानों मुंबईकरों को चिड़ा रहे थे! पूरे शहर को मानो लकवा मार गया था! एक दो रेहड़ियां, टपली खुली भी थी तो सिर्फ फल, सब्जी की... वहां भी मास्क और दो-गज दूरी...जरूरी! दुकान खुली थी तो सिर्फ दवाईयों की! सामाजिक प्राणी पिंजरे में बंद और जंगल के शेर, चीते सड़कों पर! मुम्बई का ऐसा नज़ारा मानो मरघट पर चिता जलाकर अभी-अभी लौट रहे थे थके-हारे लोग!
दूध लेकर कुछ पल बिल्डिंग में लगे बेंच पर मैं बैठ गई! ठंडी हवाएं तन को स्पर्श कर कुछ गुनगुना कर आगे बढ़ रही थी मानो कह रही हो,' बहुत दिनों बाद मिली हो'...तभी कुछ बंदर उछलकूद करते आने लगे हमारी सोसायटी की तरफ! मैंने मन में कहा,''वाह वाह! अब तो इनके मजे हैं जी! ' मैं घर की ओर चल पड़ी तभी मुझे याद आया,' आज तो यश का जन्मदिन है..गुब्बारें तो चाहिए...मगर वह गुब्बारेवाली..कई दिनों से न मैंने उस गुब्बारेवाली को देखा न गुब्बारें खरीदे! 
कहाँ होगी वह! क्रिसमस में उसका फ़ोटो लिया तो कितनी खुश हुई थी वह! कहने लगी,' मैडम जी! आपके पोते के लिए ले लीजिए न गुब्बारें!'
रंगबिरंगी गुब्बारें देख साठ की उम्र में भी मेरा मन ललचा रहा था! लाल लूं कि पिला? नहीं नहीं..वो नीला वाला कितना सुंदर है! उसपर वो सफेद फूल...मानो बादलों ने फूल बरसाएं हैं आज! क्रिसमस की रोशनाई में नहाया पूरा इलाका मुस्कुरा रहा था लेकिन गुब्बारेवाली के आंखों की चमक धूल से पटे चेहरे के बीच चमकते हीरे की याद दिला रही थी! 

कितनी मासूम थी वो बच्चियाँ! फटे-मटमैले फ्रॉक में भी कितनी सुंदर लग रही थी वो! एक कंधे पर गुब्बारों का भार, दूसरे कंधे लटकती शबनम बैग जिसमे ढेरों बिन-फूलाये गुब्बारें और हवा भरने का पम्प! जब दो-तीन गुब्बारें बचते तो वो पंप से हवा भरकर नए गुब्बारे बना उन्हें लकड़ी के स्टैंड पर टांग देती और फिर उन्हें बेचना शुरू कर देती!
क्रिसमस हो या ईद, दीवाली हो या गणेशोत्सव, उसके गुब्बारें खूब बिकते! रात को हाथ में वड़ापाव लेकर खाते-खाते वापस लौटते देखती तो बहुत खुशी होती मुझे! रात को खिड़की से इन्हें मुस्कुराते, खिलखिलाते हुए देखना मेरा नियम बन गया था!

बहुत दिनों से उन्हे नहीं देखा तो ऐसे लगा जैसे कुछ छीन गया है मुझसे! नन्हीं बच्चियों को बहुत मिस कर रही थी मैं! खास कर यश के जन्मदिन के मौके पर! पिछले बर्थडे पर सभी बच्चों के लिए गुब्बारे खरीदे थे मैंने! कितनी खुश हुई थी वो! कितने सपने पल रहे थे उनकी आंखों में! मैंने उन्हें भी थोड़ा केक और समोसे दिए थे..मगर लॉक डाउन में..सब अरमान धूल चुके थे।

कहाँ होगी वह? इतने दिन कैसे निकाले होंगे उन्होंने! गांव तो नहीं गई होगी? कैसे जाएगी? इतने पैसे होंगे उनके पास? कहीं चल कर तो नहीं गई होगी अपनी माँ के साथ! भूखी,प्यासी, अधमरी सी...पहुंच तो गई होगी न गांव?
सवालों के कई गुब्बारें एक साथ मन के आसमान में तैरने लगे।.. बच्चियों की टोह लेने लगे...लेकिन कुछ पल ही बीते थे कि वो धरती पर आ गिरे...अकेली उसकी सहेली ही दिखाई दी उसी झोले के साथ.... वह बोल पड़ी.. आंटी जी...भूरी को कोविड ख गया... मुझ से ले लो गुब्बारें!
मन के आकाश में उड़ते गुब्बारों की हवा निकल चुकी थी मानों काया से जीवन! एक अजीब खालीपन लिए  जिंदगी ने मानों गुब्बारों से नाता तोड़ दिया हो..सदा के लिए!

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत ही दिल को छू लेने वाली और बहुत ही भावनात्मक कहानी। विवरण की सराहना करता हूँ
  • आप चमकते रहें और बढ़ते रहें
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • वाह वाह! बहुत खूब! सुन्दर प्रस्तुति!
  • बहुत खूब....
  • बहुत खूब वीणा जी! पुरानी स्मृतियों में आँसू और मुस्कान का इंद्रधनुषी जलवा नज़र आता हैं।