ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ८१
भाग ८१

भोर ने चाँद-सितारों से सजी काली रजाई फेंक दी और मिचमिची आँखों से प्राची की ऒर देखने लगी। बार-बार उसने पलके झपकी। प्राची के उस पर गेंदे की पंखुड़ियाँ उछालते ही भोर खिलखिला कर कहकहें लगाने लगी। उनके शोर के बाद यहाँ-वहाँ पेड़ों पर विश्राम कर रहे खग जाग गएं और अपने कर्तव्य-कर्म में लीन हो गएं।

लाली को जो कुछ भी खाना था सुबह सुबह ही खाना था। विभा को भी कॉलेज जाना था। विभा और लाली ने मिल कर जल्दी-जल्दी चाय-नाश्ता बना लिया था। अप्पा भी सुबह की सैर कर लौट चुके थे। विभा के लिए चाय-नाश्ता  डाइनिंग टेबल पर रख कर लाली ने खुद के लिए भी नाश्ता परोस लिया। अप्पा फ्रेश होने चले गए थे तब तक लाली ने नाश्ता कर लिया था। विभा को देर हो रही थी। वह नाश्ता कर, जल्दी-जल्दी पर्स उठा कर कॉलेज के लिए निकल गई। तभी अप्पा आ गए। लाली अप्पा को नाश्ता परोसने लगी तब तक अप्पा कुलदेवी के सामने दीया-बत्ती कर आ गए। लाली ने चाय पी ली थी।  अब उसे इसके बाद कुछ भी नहीं खाना था।

अप्पा के आते ही लाली ने चाय का पानी चढ़ाया और अप्पा को ताजी, मसाले वाली चाय बना कर दी। और किसी भी बात में अप्पा की कोई खास पसंद नहीं थी लेकिन उन्हें एकदम गर्म मसाले तथा इलायची वाली चाय ही पसंद थी। इस मामले में वह बिल्कुल समझौता नहीं करते थे। 

आज अप्पा को भी डॉक्टर्स के साथ दोपहर में मीटिंग के लिए जाना था। उन्होंने सभी विचारणीय मुद्दों को अपनी डायरी में लिख दिया था ताकि कोई महत्त्वपूर्ण मुद्दा न छूटे। हॉस्पिटल की जो सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थी वो थे डॉक्टर! उनकी सलाह, सुझाव तथा सोच इस कार्य में बहुत महत्वपूर्ण थी। उन्हें कौनसी सुविधाओं की आवश्यकता हैं जिनके बिना उनका कार्य सुचारु रूप से नहीं हो सकता उन्हें अप्पा ने प्राथमिकता दी थी। अतिआवश्यक मशीनों के आर्डर जारी कर दिए गएं थे। अस्पताल के काम के लिए कौशल से परिपूर्ण श्रम शक्ति की आवश्यकता होती हैं यह वह जानते थे। प्रशिक्षित लोगों की उन्हें जरूरत पड़ेगी, उनका चुनाव तथा नियुक्ति के लिए एक अनुभवी तथा कर्मठ डॉक्टर के नेतृत्व में उन्हें कमिटी बनानी थी ताकि वो सब निर्णय विशेषज्ञ की सहमति से उचित समय पर हो सकें और इन्ही सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए आज की मीटिंग थी।

एक बड़े अभियान की सफलता उसके सही व्यवस्थापन तथा समय पर लिए गए उचित निर्णयों पर भी निर्भर होती हैं। अप्पा ने यहाँ कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अपने पहचान के दायरे में से उन्होंने हर क्षेत्र के हीरे चुन लिए थे अपने अभियान को सफलता बनाने के लिए।

आज विभा को लाली के साथ शाम को क्लिनिक जाना था तो उसने कॉलेज के सभी पीरियड्स ख़त्म होने के बाद यश, वैदेही और वज्र के साथ पढ़ाई की। बाद में नितीन सर से बात कर, कुछ नाश्ता वगैरा कर वो बैडमिंटन कोर्ट पहुँच गएं। 

प्रैक्टिस के समय ही आ कर नितीन सर ने यश को कुछ टिप्स दिए और दो दिन के बाद लख़नऊ जाने की बात दोहराई। उन्होंने बाकी खिलाडियों को यश का उदाहरण दिया और कहा कि तमगे जीतने के लिए ऐसी जीवट, जिजीविषा और लगन की जरुरत होती हैं। 

विभा और वीणा को नितीन सर ने बधाई दी और उनका चयन आगे के प्रशिक्षण के लिए हुआ हैं यह खुशखबरी भी दी। सर ने विभा और वीणा की प्रशिक्षण के लिए चंडीगढ़ जाने के लिए टिकट भी बुक कर दी थी। विभा और वीणा दोनों के लिए यह खुशखबरी बहुत मायने रखती थी। यह प्रशिक्षण उनके लिए भारतीय टीम का हिस्सा बनने का स्वर्णिम अवसर था। कॉलेज के लिए भी यह गर्व का विषय था कि महाविद्यालय के तीन खिलाडी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे हैं।

विभा और यश दोनों भी बहुत खुश थे। यश की चयन स्पर्धा लखनऊ में थी और विभा की चंडीगढ़ में लेकिन दोनों के लिए सुकून की बात थी कि दोनों को देश के लिए खेलने का मौका मिलने की प्रबल संभावना थी।

पिछले हप्ते के उदासी से भरे अंधकारमय माहौल में उम्मीदों की किरण दिखाई दे रही थी। सपनों को नए पँख मिलने की संभावना ने मित्र-मण्डली की कोशिशों में जान डाल दी थी। वीणा भी अब धीरे-धीरे मित्र-मंडली से मजबूत जोड़ सी जुड़ रही थी।

वीणा का परिवार एक राजस्थान के दूरदराज के गाँव से मुम्बई आया हुआ परिवार था। वीणा तीन भाई-बहनों में सब से बड़ी थी। पिताजी ने अपने वक़्त में जबरदस्त संघर्ष कर इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पदवी हासिल की थी। एक दशक पहले नई-नई आजादी प्राप्त इस राष्ट्र के पास उच्च शिक्षा के लिए न तो संसाधन थे न शिक्षा व्यवस्था! मेधावी छात्रों को विदेश में प्रशिक्षण लेने जाना पड़ता था। सरकार अपने मेधावी छात्रों को अपने खर्चे पर शिक्षा के लिए विदेश भेज रही थी। 

वीणा के पिताजी विदेश से परास्नातक (मास्टर्स) की पदवी प्राप्त कर आएं थे। उनपर संयुक्त परिवार का भार था। एक निश्चित कमाई घर परिवार चलाने के लिए जरुरी थी। उन्होंने बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रस्ताव ठुकारा कर छात्रों को कौशल शिक्षा दे कर उन्हें आगे लाने का बीड़ा उठाया था। 

अब तो वो रिटायर हो चुके थे। ज्यादातर अपना समय अपने गाँव की पुश्तेनी हवेली में ही बिताते थे। उनकी पेंशन से उनका और दोनों भाई-बहन की पढ़ाई का खर्चा निकल जाता था। लेकिन अपने सपने वे बेटी के माध्यम से पूर्ण करना चाहते थे। उन्हें ज्यादातर व्यक्तिगत खेलों में रूचि थी और वीणा में भी वहीं आग धधक रही थी। व्यक्तिगत खेलों में आपकी स्वयं की प्रतिभा आपको आगे बढ़ने का मौका देती हैं यह वह जानती थी। पहली बार था कि उसका महिला युगल स्पर्धा के लिए चयन हुआ था। उसके लिए दूसरे खिलाडी के साथ तालमेल बैठा कर खेलना थोड़ी टेड़ी खीर महसूस हो रही थी लेकिन अब वह सीख गई थी। उसमें सीखने की जबरदस्त लगन थी।

मुम्बई में वह अपने मामाजी के दुकान में पार्ट-टाइम काम भी करती थी और पढ़ती भी थी। वह कॉमर्स की विद्यार्थिनी थी। आजकल ज्यादातर बच्चें व्यावहारिक हो गएं हैं । पढ़ाई के साथ-साथ आंशिक स्तर पर काम कर वह अपना खर्च खुद उठाना चाहते हैं न कि अपने बुजुर्ग माता-पिता पर उसका बोझ डालना चाहते हैं। वीणा भी उन्हीं में से एक थी। वह अपने पिता से हमेशा कहती, " पापा! मुझें दहेज में धन-संपत्ति न मिले कोई बात नहीं लेकिन विद्या-धन जरूर देना। यह न कभी ख़त्म होता है न कोई चुरा ले जा पाता है! विपदा में यही काम आता है!  और फिर आग लगने पर कुआँ खोदने का क्या फायदा? उसके पिता अपनी लाडली बेटी की बात सुन कर मन ही मन मुस्कुराते!

मामाजी के यहाँ से जो मेहनताना मिलता था उससे उसका खर्चा आराम से निकलता था। पैसे के लिए उसे किसी पर निर्भर रहना नहीं पड़ता था। वैसे यह गाँव की छोरी थी बड़ी बिनधास्त! रोड-रोमियों को तो वह बिल्कुल घास नहीं डालती थी। बम्बईया भाषा में ऐसे लताड़ती कि बेचारा दूम दबा कर यूँ भाग जाता मानों गधे के सिर से सिंग।

विभा मन ही मन सपने बुनने में व्यस्त हो गई थी। मन के आकाश में छाया कोहरा उम्मीदों की सुनहरी किरणों से छंट गया था। लाली की एक घटना सबको झकझोर कर उदासी के अंधेरें में धकेल गई थी लेकिन अब इक्का-दुक्का जगमगाते सितारे को देख वह फिर नए-नए सपनों में रंग भरने लगी थी। खुद पर नाज़ करने जैसा मौका उसके हाथ आ चूका था। वीणा से तालमेल जरुरी था खेल के लिए भी और मित्र-मण्डली के स्वर्णिम भविष्य के लिए भी।

विभा तीन बजे तक घर पहुँच गई थी। अप्पा को चार बजे निकलना था। लाली ने जल्दी-जल्दी विभा को खाना परोसा और अप्पा के लिए इलायची वाली, मसालेदार चाय बनाने लगी। अप्पा ने जानकी जी को छ: बजे तैयार रहने को कहा था। वैदेही वज्र के यहाँ रुकने वाली थी। वज्र ने विभा को फ़ोन कर गाड़ी भेजने का प्रस्ताव रक्खा लेकिन अप्पा ने कहा वो 'ओला' कर पहुँच जाएंगे। कुछ जरुरत पड़ी तो वो खुद उसे फ़ोन करेंगे!

अप्पा सही समय पर मीटिंग के लिए निकल गए। समय की कदर करना वह जानते थे और इसी वजह से वो सफलता के शिखर पर पहुंचे थे। विभा के चयन की बात  सुनकर वो स्वयं भी बहुत खुश हुएं। बेटी ने आज तक उन्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था। यश को दो दिन बाद लखनऊ जाना था। इस बार उसे पूरा सप्ताह वहीं रहना था। वहाँ खेल और पढ़ाई, दोनों पर उसे समग्र ध्यान देना था। फिर किस समय क्या मुसीबत आ धमके इसका तो बिल्कुल भरोसा था नहीं! इसलिए वह पहले ही सारी तैयारी करना चाहता था। 

थोड़े समय के लिए विभा और लाली ने आराम किया और दोनों छ: बजे के लगभग तैयार ही गई। उसने अपने साथ साथ लाली का भी एक परिधान एक्स्ट्रा ले लिया था। लाली की फाइल, मोबाइल का चार्जर, एक पढ़ने के लिए मुंशी प्रेमचंद साहित्य से जुड़ी किताब भी उसने अपने साथ ले ली थी।

डॉक्टर के द्वारा लाली की जो गर्भाशय की थैली साफ़ करने की छोटी सी शस्त्रक्रिया की जानेवाली थी उस समय उन्हें बाहर बैठ कर इंतज़ार ही करना था। विभा ने सोचा, किताब पढ़ते-पढ़ते समय भी गुजर जायेगा और थोड़ी-बहुत पढ़ाई भी हो जाएगी और मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते-पढ़ते चुनौतियों से भिड़ने का हौसला भी आ जायेगा!


स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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