मायलडी म्हारी!
 मायलडी म्हारी!

कविता: मातृभाषा राजस्थानी में ...

शीर्षक: मायलडी म्हारी!

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!

स्त्री-भ्रूण जाण पालो न म्हा सूं खार,

थोड़ी सी हिम्मत से कर दो बेड़ा पार!

नानो सो जीव! म्हासूं करो न बैर,

थारो अंश हूँ मैं, नहीं हूँ मैं गैर!

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!

कर्मों रा कैसा हें जी यें उल्टा फेर?

विनवू जी मायर वाली, भ्रूण-हत्या में न करो म्हानें ढ़ेर!

मायर म्हारी! कोख में मार कल पछतावो भारी,

फटी चुनर-चोली नें क्यों लगावो कारी?

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!

मायलड़ी म्हारी! बळती आग सा करों तेवर,

मत परणावो म्हाने मायालड़ी म्हाने नानी उमर!

जामाण जायी... क्यों बोले दोरी-दोरी?

थारा आँगन री म्हे तों केसर क्यारी!

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!

मूंगा मोल रा करू न ज़िद, शौक भारी,

थारा हिवडा रो हार बन हरु म्हे देनदारी!

कर परिजन री सेवा उतारू कर्ज सारा,

दूध रो मोल चुकाऊं, वधाऊ मान थारा!

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!

महल-मेरी न मांगू, न मांगू हिस्सेदारी,

कालजा नें ठारु, कुल री शोभा न्यारी!

मायलड़ी म्हारी! दीजे अभय दान म्हाने,

वंशवेल बढाऊ पराई, दूँ शीतलता थाने!

मायलडी म्हारी! देखण दे संसार,

कुक्षी में थारा दे दे म्हा सूं विस्तार!

दहेज़-असुर मार बनु म्हे मर्दानी थोरी!

अन्तरिक्ष नाप आऊं, जोडू पुनवानी भारी!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा |

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