ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. 89
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. 89
भाग 89

यश का आज अंतिम मैच था। इसका प्रदर्शन अच्छा होना बहुत जरुरी था ताकि अंक तालिका में वह अव्वल रहे। आज गौरव सर ने सबको आमंत्रित किया था सुबह कोर्ट पर। 'हर कोई चाहता था एक मुट्ठी आसमान! ' लेकिन किसी के प्रयास कम पड जाते थे तो किसी का आत्मविश्वास! किसी की लगन तो किसी की जीवट! 
गौरव सर ने सबसे इसी बात पर अपने विचार साँझा किए और सब को समझाया कि जीत से फूल मत जाना और हार से रास्ता मत बदलना। चुनौती हर मोड़ पर होगी, आपको दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ना हैं!

सभी बहुत ही अभिभूत थे गौरव सर को देख कर! उनका हंसमुख चेहरा, निष्कपट भाव-भंगिमा और जीवट-जिद्द देख कर हर कोई ऊर्जा से भर जाता। संघर्ष-क्षमता की गौरव सर खुद एक जीती-जागती मिसाल थे। जीवन के उतार-चढ़ाव को हँसते-हँसते स्वीकार कर आगे बढ़ने का हौसला स्वयं उनका अपना सफ़रनामा ही दे देता था।

यश को आज का मैच खेल कर मुम्बई लौटना था। रात की फ्लाइट की बुकिंग हो चुकी थी। यश ने सुबह कुछ हल्का नाश्ता कर लिया था। खाने में कुछ सलाद, ज्वारी की भाकरी और थोड़ी पत्ता भाजी ले कर उसने भोजन सम्पन्न किया और विभा से फ़ोन पर बातें करने लगा। " हाय ब्यूटी क्वीन! कैसी हो? मुंशी प्रेमचंद जी का उपन्यास पूरा पढा कि नहीं? अब किसकी बारी? अमृता प्रीतम या सुभद्राकुमारी जी की! कभी-कभी पढ़ लिया करो यार! कॉलेज की फीस तो वेस्ट नहीं होगी! " अब विभा को उसने छेड़ा था तो फिर वह कौनसी चुप रहने वाली थी! " अरे मोटू! सिर्फ खाने-पीने में ही ज़िन्दगी गुजार देगा या कुछ करेगा भी? वरना दुनिया में आया और चला गया। "
"अरे यार! तू कहाँ मुझे ऐसे ही जाने देगी? तेरा ही तो ख़्वाब पूरा करने की जद्दोजहद में लगा हूँ! तुझे देखना हैं न मुझे पैरलिम्पिक के पोडियम पर! अब 'झाँसी की रानी' की इच्छा पूरी न हुई तो... बगावत... बगावत!" यश बोल पड़ा!
तभी विभा ने शिकवे-शिकायतों का पुलिन्दा खोल दिया और कहा ," अब इस जन्मदिन पर बहाना मत बनाना! अपुन को पार्टी मंगता हैं... मतलब... मंगता ईच है ! क्या भिडू! " यश को समझ में आ गया... यह नया 'टैलेंट' विभा में वीणा की दोस्ती से ही आया है! वह बोल पड़ा, " अपुन को आने तो दे पहले मुम्बापुरी में ! फिर देख कैसी 'झकास' पार्टी देता हूँ मेरी ब्यूटीक्वीन को! " और दोनों कहकहें लगाने लगे। ऐसे लग रहा था मानों वासंतिक हवा के झोंकों ने फूलों की बारीश कर दी है और सारा वातावरण खुशबू से सराबोर हो गया है। 

इन्सान की भी फ़ितरत समझ में नहीं आती! अक्सर भीड़ में भी खुद को अकेला-तन्हा महसूस करता हैं और जब तन्हा-अकेला होता हैं तब इंतज़ार करता किसी के आने का, मोबाइल की रिंगटोन का, एक प्यारी सी पुकार का! कौन कम्बख्त इस संसार में अकेला रहना चाहता हैं? हर कोई चाहता हैं एक अदना सा दोस्त, एक साथी जो उसके मन की बात बिना कहे ही समझ सकें, एक मित्र जो आगे गड्डा देख कर उसे झपट कर रोक ले, दर्द में अपना कन्धा आगे कर उसे इत्मीनान से रोने दे और फिर उसे सहारा दे कर नई ऊर्जा से भर दे!

विभा से उसका दिल जुड़ा था। दूरियाँ हो या नजदीकियाँ, फासलें भी अक्सर बहुत होते थे लेकिन दोनों एक-दूजे की दिल की बात समझ जाते थे। जब भी वो एक-दूसरे से फ़ोन पर बात करने की सोचते दोनों में से किसी न किसी का फ़ोन आ ही जाता उसी वक़्त...जरूर। कोई इसे टेलीपैथी कहते तो कोई चिट्ठी-तार बिना का सन्देश! जो भी हो...शायद इसी एहसास को प्यार कहते हैं! चोट एक को लगे, दर्द दूसरे को हो! ख़ुशी एक को हो और चेहरा कमल सा दूसरे का खिलखिलाएँ!

सूरज पश्चिम की ऒर बढ़ रहा था और यश की प्रतियोगिता समापन की ऒर! आज अंतिम मैच में दमखम जरुरी था। यहीं वो मैच था जो उसे बढ़त दिला सकता था। यश की एक अच्छी आदत थी। वह कभी भी अपने प्रतिद्वंदी को 'अंडर एस्टीमेट' यानि कि कम नहीं आंकता था। नया हो या पुराना खिलाडी, वह हमेशा सोचता कि इस खिलाडी से मैं पहली बार खेल रहा है और उसका फायदा यह होता कि उसके बारे में मन में कोई पूर्वाग्रह नहीं होता। वह जैसे हर दिन को चुनौती समझता वैसे ही वह हर मैच को चुनौती के रूप में लेता और अपना सब कुछ दाँव पर लगा देता। उसकी जिद्द और जद्दोजहद उसके विशेष गुण बन जाते और जीत भी वरमाला पहनाने उसकी ऒर खींची चली आती!

फलक पर लालिमा छाई हुई थी, सूर्य अब अलविदा कहने के मुड में था और यश सफलता की चोटी पर खड़ा रहकर सूर्यदेवता को स-सम्मान विदा करना चाहता था। 

यश हमेशा मैच के पहले खुद को शांत और एकाग्र कर देता था। मन के स्पंदन पर उसका खूब नियंत्रण था और खेल के वक़्त उसका ध्यान कभी भटकता नहीं था
खेल उसके किए तपस्या थी और जीत आगे बढ़ने का मौका। यश का नाम पुकारते ही वह कोर्ट पर पहुँच गया। सामने नया खिलाडी था लेकिन जोश से भरपूर! वैसे भी पैरालिम्पिक स्पर्धाओं में कमजोर मनोबलवाले टिक ही नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें अपनी शारीरिक कमजोरी के खंदक को अपने उतुंग मनोबल से पाटना पड़ता था। यश ने प्रतिद्वंदी से हाथ मिला कर उसे शुभेच्छा दी और अपने कोर्ट में पहुँच गया। 

प्रतिद्वंदी खिलाडी में भले ही जोश भरपूर था लेकिन अक्सर चुनौतिपूर्ण स्थितियों में अनुभव काम आता है और वहीं हुआ। यश ने कम संघर्ष के बाद ही जीत हासिल की मगर वह सामनेवाले खिलाडी को मिलकर बधाई देना नहीं भूला। आखिर आप कितने भी बड़े खिलाडी क्यों न हो, अगर आप में खिलाडी वृत्ति नहीं है तो वह खेल आप में सिर्फ अहंकार का ही सृजन करेगा, मानवीय शाश्वत मूल्यों का संवर्धन नहीं।

यश अब सभी से मिल रहा था। सभी भारत के अलग- अलग प्रांतों से भले ही आएं हो लेकिन सबका मक़सद एक था। माँ भारती के भाल पर कुंकुम तिलक कर उसके रत्नजडित मुकुट को दुर्लभ रत्नोसे सुशोभित करना!  यश ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई थी। कहीं भी नितीन सर और गौरव सर को अपने चयन पर दुबारा सोचना पड़े ऐसा कोई छिद्र ही नहीं छोड़ा था। 

सभी से मिलकर यश अपने कमरे की ऒर चला गया। सभी सामान बिखरा पड़ा था उसे समेटना था। वह थक तो गया था लेकिन खुद यह काम करने के सिवा पर्याय था ही कहाँ?

अकादमी की गाड़ी उसे दस बजे एयरपोर्ट छोड़ने वाली थी। उसने जल्दी-जल्दी बैग पैक की और भोजन के लिए डाईनिंग हॉल में चला गया। हॉल में सभी खिलाडी, कोच उपस्थित थे। सभी एक-दूजे से मोबाइल नंबर ले रहे थे, पता पूछ रहे थे और अपने मोबाइल में उसे दर्ज कर रहे थे। यश ने समय का भान रखते हुए भोजन किया और निकल पड़ा कमरे की ऒर! अकादमी की गाड़ी आने के पांच मिनट पहले वह लॉबी में सोफा पर बैठ कर उनका इंतज़ार कर रहा था। 

तभी वज्र का फोन आया। उसने बताया कि गाड़ी उसे लेने छत्रपति शिवाजी महाराज मुम्बई एयरपोर्ट पर समय पर पहुँच जाएगी। यश की सारी चिंता ही फुर्र हो चुकी थी...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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