वसंत ऋतु

वसंत ऋतु:

आज फरवरी 1 बसंती हवा के साथ इस महीने का भी आगमन हो गया। बसंती हवा! इस शब्द को लेकर मन में कई प्रश्न आ रहे हैं कुछ सही लग रहे हैं और कुछ विसंगत से। आज जब सुबह उठी तो मन से कुछ समय चर्चा में मैं ऋतुओं की आजकल बदलती हुई अवस्था के बारे में बात की।

बचपन में जब वसंत ऋतु के बारे में कुछ बोलने को कहा जाता था तो पहला वाक्य मेरा यही रहता था कि यह ऋतु मेरी सबसे पसंदीदा ऋतु है। क्यों नहीं! क्योंकि यही एक ऋतु है जब हम हल्की सर्दी एवं हल्की गर्मी दोनों का आनंद ले सकते हैं। वही बचपन की सोच।

शिक्षक जब हमें वसंत ऋतु की विशेषताएं बताते थे तू वह हमें याद रह जाती थी और अभी भी याद है क्योंकि वह विशेषताएं हम अपनी आंखों से देख भी पाए थे और मन से महसूस भी कर पाते थे। सुखद तापमान में खिले हुए फूल ,नई-नई पौधों पर आने वाली पत्तियां उनका तो क्या ही कहना सूखे हुए पत्तों के बीच यह नहीं पत्तियां ऐसी लगती थी जैसे कहना चाह रही हों, कि देखो हमें और सीखो हमसे कि बुरा वक्त निकालने के बाद सुखद्क्षण अवश्य आता है मन पिछले वक्त ने बहुत पीड़ा डी पर अब जो समय सुखद्क्षण का है वह उसे पीड़ा को कहीं और पीछे छोड़ देगा। वैसे ही जैसे पेड़ों की सूखी पत्तियां नहीं पत्तियों के लिए नीचे गिरती जाती है और पेड़ हरे लाल पत्तों से लद जाता है। नए-नए फूलों की सुगंध ऐसा लगता था कि बस इन्हीं ही निहारत रहो। हालांकि उन पर आने वाले भवरे एवं मधुमक्खियां मुझे कभी नहीं सुहानी उनका तो बस एक ही कम लगता था कि शांति से फूलों को देखने वालों को परेशान करना या नहीं मानते हैं तो डंक मार देना। हंसी आ जाती है उन क्षणों को याद करते हुए। आईने बताया था कि गीता में श्री कृष्ण ने स्वयं को वसंत ऋतु के समान बताया है। शायद इन्हीं कुछ छोटे परंतु महत्वपूर्ण कर्म से यह रितु मुझे सबसे प्रिय थी। थी! इसीलिए क्योंकि आज के समय में वर्तमान में मुझे इनमें से कुछ भी होते हुए नहीं दिख रहा। यह सुनने में थोड़ी बड़ी बात लगती है परंतु कुछ पेड़ों और जगह के अलावा मैंने कहीं भी वसंत ऋतु को खिलखिलाते हुए नहीं देखा। दुख होता है यह कहते हुए की कुछ ही समय में प्रकृति कितनी परिवर्तित हो गई है अभी की तो बात लगती है जब ताऊजी के पास वाले घर के आंगन में सेवंती के फूलों की बहार छाई रहती थी पर अब ना वह घर रहा ना आंगन घर वालों ने अपनी जब संपत्ति बेची तो लेने वाले ने जैसे फूलों पर दुश्मनी निकाल हो उसने सबसे पहले काम आंगन को मिटाने का किया अब वहां एक बड़ी इमारत है पूरी सुविधाओं से युक्त बस वह पौधे नहीं है। कई लोग कहते हैं की इमारत बहुत सुंदर बनी है बनी होगी मानती हूं ,परंतु न जाने क्यों अब वहां जाने का मन नहीं करता। कुछ दिन पहले जब आई ने भारी गर्म कपड़े वापस रखने की बात कही तो लगा अरे !सर्दी इतनी जल्दी खत्म हो गई। खत्म शब्द ही उचित लगता है आजकल के मौसम को देखते हुए वहीं अब वसंत जैसा कुछ लग ही नहीं रहा गर्मी तो ऐसे आई है जैसे कितने वर्षों के बाद मायके में बेटी आती है। जी भर के। सूखे पत्ते तो दिख रहे हैं पेड़ों पर लेकिन नई पत्तियां नहीं दिखती। हर वर्ष पिछले वर्ष से अधिक गर्मी पड़ती है खैर यदि मैं मौसम संबंधी सारी बातें याद करूंगी तो लगता है प्रश्न कम पड़ जाएंगे पर मेरे विचार नहीं। इस बार लोगों के हिसाब से वसंत पंचमी दो दिन चली माता सरस्वती से बस एक ही प्रार्थना है कि मेरी बुद्धि कभी प्रश्न मत होने देना जहां पर आने वाले शब्द सदैव दूसरों की भलाई के लिए ही निकले। विद्यालय में पढ़ते हुए मैंने आज के दिन होने वाली कई चीज सीखी थी जैसे हमारा विद्यालय उन सभी बच्चों का विद्यारंभ संस्कार करवाता था जो आब शिक्षा की पहली सीढ़ी चढ़ने वाले हैं ।स्लेट पर ओम बनवाना ,हवन करवाना यदि उन दिनों की बात करूं तो लगता है कि मैं अपने शिक्षकों आचार्य से कितना कुछ सीखी हूं।विद्यालय में यह मान्यता थी कि वसंत पंचमी का हवन होने के पश्चात हमें मन ही मन कुछ ऐसी वस्तु का त्याग करना चाहिए जो समय के साथ हमारे लिए प्रतिरोध बन सकती है प्रारंभ में मैं इस खेल मानकर कभी चाय कभी कॉफी या कभी बाहर का भजन इसे त्याग समझती थी परंतु समय के साथ इसका महत्व जानते हुए मैंने पूर्ण प्रयास किया क्रोध ,लोभ ,मोह माया को त्यागने का ।इनको पूर्णता त्यागना अभी भी कठिन लगता है परंतु संभव अभी भी नहीं लगता। घर आकर जब आई केसरी भात देती थी तो उसे आनंद को मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। लेकिन जब आज मैं यह लेख लिखकर अपना अनुभव व्यक्त करना चाहती हूं तो लगता है कि समय जैसे वही उसी काल में थम गया है। ना कहीं बसंती हवा चलती महसूस होती है ना नए-नए फूलों की सुगंध मिलते हैं तो सिर्फ बनावटी फूलों जिनकी बस सुंदरता ही देखने लायक है सुगंध उनके लिए एक प्रश्नवाचक चिन्ह है। पेड़ों से सूखी पत्तियां तो गिर रही है परंतु वह आनंद यदि वापस लेना चाहूं जिसमें मुझे बचपन की याद आए तो पास से लोग निकालते हुए ऐसी विचित्र नजरों से देखते हैं कि यह मनुष्य प्रकृति का आनंद कैसे ले सकता है? देखा है मैं उन लोगों को जो प्राकृतिक वस्तु एवं प्रकृति को छूने बिना बनावटी सुंदर वस्तुओं को निहारत हैं। ऐसे लोगों के लिए शायद यदि कोई मनुष्य प्रकृति की कदर करता है तो वह मूर्ख है। मूर्ख ही है जो बस लोगों की नजरे घर से वहां आनंद लिए बिना उन्हें इसका महत्व समझाएं बिना वहां से चुपचाप चला जाता है। एक लेख ही ऐसा माध्यम है उसे मूर्ख व्यक्ति के लिए की अपने मन की जिज्ञासा अपने मन की इच्छा जो वह उन सभी समझदार प्राणियों को बताना चाहता है लिख दे। वह सभी वस्तुएं वह किसी को बोल नहीं सकता भले ही उसकी बातों को लोग बस चंद भर का आक्रोश मानकर वही बनावटी वस्तुओं के पीछे पड़ जाए। आक्रोश बहुत ही बड़ा शब्द लगता है परंतु शायद उनके लिए नहीं जिसने बचपन से बड़े तक एक पेड़ को देखा हो झूला उसे पर लगाए हो फल उसके खाए हो छाया में उसकी खेल हो और अंत में उसको कैट देखा हो जैसे वह कुछ नहीं। जी रितु की सबसे बड़ी पहचान ही वृक्ष है वहीं कहीं ना कहीं लगता है लोग तोता जा रहे हैं लगता है मानो कह रहे हो कि मनुष्य यदि तू प्रकृति की असल सुंदरता का प्रत्याशी कारण नहीं चाहता तो तुझे मेरी क्या आवश्यकता।आने वाले दिन कैसे होंगे नहीं जानती परंतु इतना पता है कि वसंत और वसंत जैसा नहीं आएगा और हम बस नकली दिखावे में उलझे बैठे रहेंगे क्योंकि आजकल की विचारधारा के अनुसार जो सुंदर दिखेगा वही सुंदर होगा चाहे उसकी वास्तविकता भले ही कोसों दूर क्यों ना हो झाड़ती हुई पत्तियों के सुंदरता से शायद आने वाली पीढ़ी वंचित ही रह जाएगी।


    द्वारा Sanjivani Aphale
    Shared29 Aug 2025
    Start29 Aug 2025
    End29 Aug 2030
    इस पर लोग क्या कह रहे हैं
    • पर्यावरण के प्रति आपका लगाव अदभुत हैं! एक अलग प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई!🙏❤️🙏❤️🙏
    • बहुत अछा