ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ८३
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ८३
भाग ८३

विभा के मानस पटल से उस नव-विवाहिता का  जला हुआ चेहरा जा ही नहीं रहा था। न जाने कितने सवाल उसके मन के दरया में हुलारें मार रहे थे। बार-बार लहरों से उठे प्रश्न किनारे पे आ कर, सिर टकरा कर वापस लौट रहे थे। 
आखिर क्यों एक स्त्री जीवन के सुवर्ण-काल में स्वयं ही दुनिया को अलविदा कहने का निर्णय लेती है? यह कौनसी मनोदशा होती हैं स्त्री की जब वह खुद को अपने सपनों के साथ दफ़न करने को उतावली हो जाती है? क्यों हमारी शिक्ष-दीक्षा, परिवार का सम्बल उसे जीने का हौसला नहीं दे पाता? क्यों टूट जाती हैं उसकी आत्मविश्वास की डोर हल्के से वक्त के झटके से?

जितना विभा मन की टोह लेने गहराई में उतर रही थी और-और भंवर में फंसती जा रही थी। सवालों के जबाब तो मिलने से रहें, नए-नए सवाल और जन्म ले रहे थे। उसने मन से इन्हें हटाने की बार-बार कोशिश की मगर वह सफल नहीं हो पाई। उसका संवेदनाशील मन घूम-फिर कर उसी चौराहे पर आ कर रुक रहा था जहाँ से वह पीछे मुड़ना चाहती थी पर मुड नहीं पा रही थी। 

भटकते-भटकते विभा को जवाब मिल गया था। जब तक स्त्री खुद मजबूत-सशक्त नहीं होगी, सब मिलकर अन्याय के विरुद्ध 'येलगार' नहीं करेगी, अपनी मदद को श्रीहरि को पुकारती रहेगी तब तक यें हादसे होते रहेंगे। जो स्वयं की मदद नहीं करता उसकी मदद कोई दूसरा क्यों करेगा?

इसलिए तो किसी शायर ने कहा हैं, 
" खुद ही को कर बुलंद इतना कि खुदा बन्दे से खुद पूछें, बता तेरी रज़ा क्या है?"

विभा का मन अब कुछ-कुछ शांत हो गया था झील की सतह सा। खाना खा कर सभी सो गए थे। लाली की माँ दगड़ा बाई थालपीठ बना कर लाई थी। सभी ने लहसुन की चटनी, मक्खन के साथ थालपीठ का आनन्द लिया और कुछ समय बातें कर फिर निंदिया रानी के आगोश में समा गएं। कल महाशिवरात्रि की छुट्टी थी। सभी आराम से सो गएं। किसी को सुबह जल्दी उठने की जल्दी नहीं थी लेकिन जिनकी आदत जल्दी उठने की होती हैं उनकी नींद उसी समय पर खुल जाती हैं।

दगड़ा बाई हमेशा की तरह भोर में ही उठ गई थी। झाड़ू-पोछा कर घर में गुलाब जल छिड़क कर सारे घर को उन्होंने पवित्र कर दिया था। अप्पा भी उठ गए थे। वो नित्यकर्म निपट कर सुबह की सैर पर निकल गए थे और विभा अभी-अभी आँखें मलती बाहर आ गई थी।

दगड़ा बाई ने चाय बनाई और विभा के लिए तथा अपने लिए मग में उंडेल दी। वह कल साथ में मेथी की मठरी ले आई थी। विभा को चाय के साथ उसने मठरी प्लेट में दी और खुद भी ली। अपनी माँ के हाथ की मठरी विभा अच्छी तरह पहचानती थी। उसने चाय के साथ उसका मजा लिया और दगड़ा बाई को लाली के बारे में पूछा।

लाली स्वस्थ थी। थोड़ी कमजोरी के कारण उठ नहीं पा रही थी। विभा ने उसे जब भी जागे तो नाश्ता करा कर दवा देने को कहा। दवाईयाँ विभा ने खुद निकाल कर देने की बात कहीं और दगड़ा बाई पोहे बनाने में लग गई। अप्पा सैर-सपाटा कर आ चुके थे। हाथ-मुँह धो कर भगवान के सामने दीया-बत्ती कर, चन्दन की अगरबत्ती जला वो दीवान खाने में आ बैठे। दगड़ा बाई ने चाय बना दी थी। अप्पा की सेवा वह बीस सालों से कर रही थी। उनकी एक-एक आदत को वह जानती थी। वो तो उन्हें 'देव माणूस' ही कहती थी।

छोटी सी उम्र में दगड़ा बाई के पति धोंडुराम की मृत्यु के बाद इसी 'देवमाणूस' ने उन्हें सहारा दिया था। माँ तो पति और जँवाई की अकाल मृत्यु के धक्के से दो साल में ही 'देवा च्या घरी' जा चुकी थी और अभागी दगड़ा अपनी दो साल की बच्ची को लेकर अप्पा के यहाँ ही रह रही थी। न घर न खेती-बाड़ी! जवान दगड़ा कहाँ रहती अकेली 'गीधड़ों की बस्ती' में? अप्पा ने उसे सहारा दिया, रहने को ठिकाना, हाथ को काम! कैसे चुकाती दगड़ा बाई इस कर्ज को?

दगड़ा बाई ने अप्पा को चाय, पोहे और मठरी दी तब तक लाली भी बाहर आ चुकी थी। अप्पा ने उसे ऊपर कुर्सी पर बैठने को कहा। लाली की माँ ने उसे भी चाय, पोहे और मठरी दी और विभा को बुलाया। वह देवघर में ध्यान कर रही थी। लाली का हालचाल पुछ कर वह भी पोहे खाने लगी। 

दगड़ा बाई कुछ लाने रसोई में गई तभी अप्पा ने विभा और लाली को कहा कि दगड़ा को सच्चाई मालूम नहीं है ! अप्पा ने उसे यहीं कहा था कि बच्ची को अचानक अतिरक्तस्त्राव होने लगा इसलिए डॉक्टर ने उसे थैली साफ़ कराने को कहा। अप्पा ने बाकी कुछ न उसे बताया न किसी और बताने कि इजाजत दी। उन्होंने कल सुबह कराड के लिए निकलने की बात कहीं और लाली और दगड़ा बाई को सुबह पांच बजे तैयार रहने को कहा। लाली में न कुछ पूछने की हिम्मत थी न कुछ कहने की। उसने सिर्फ 'हाँ' में गर्दन हिलाई और अंदर चली गई।

आज मित्र-मण्डली ने यश के यहाँ जाने का निर्णय लिया था। आज वीणा भी आने वाली थी। वह दादर में अपने मामा-मामी के साथ रहती थी। मामा-मामी को शादी हो कर दस साल हुए थे लेकिन उन्हें बच्चा नहीं हुआ था। वह वीणा को ही अपनी बच्ची समझते थे। वीणा भी उनका खयाल रखती थी। बहुत दिनों से तनावग्रस्त माहौल ही था मित्र-मण्डली के आसपास। वो कुछ बदलाव चाहते थे। दोपहार के दो बजे का समय निश्चित हुआ था। 

आज दगड़ा बाई के हाथ का खाना खा कर विभा बड़ी प्रसन्न थी। इस परिवार के प्रति उसका प्यार और कृतज्ञता का भाव जब भोजन में घुल जाता तो भोजन का स्वाद कुछ अलग ही हो जाता। लाली को भी दगड़ा बाई ने नर्म गीली खिचड़ी बना कर खिलाई थी। आखिर माँ तो माँ होती हैं। अपनी एकलौती बेटी का ध्यान उससे ज्यादा कौन रख सकता था?

अप्पा ने कल साथ ले जाने के हिसाब से पुरण पोळी तथा 
मसाला भात बनाने को कह दिया था। जहाँ तक हो सकें वह हॉटेल का खाना खाना टालते थे। उन्हें पहले से ही घर का खाना ही पसंद था। दगड़ा बाई की तैयारियाँ अभी से शुरु हो गई थी। विभा ने उन्हें दवाईयों के बारे में समझा दिया था। वैसे तो लाली को भी उसने समझा दिया था। 

सभी दो बजे यश के यहाँ पहुँच गए। वीणा तो एक बज कर पैतालिस मिनट पर ही यश के यहाँ पहुँच गई थी। वैदेही और वज्र पांच मिनिट पहले तो विभा दो के ठोके पर यश के घर के द्वार पर थी। 

यश बोल पड़ा, "देखो! घड़ी को भी पता है कि महारानी दो बजे ही महल में प्रवेश करेगी।" सभी हँसने लगे। विभा ने वीणा से वज्र और वैदेही को मिलाया। दोनों भी उसकी ऊर्जा से प्रभावित हुएं।

यश ने सारी तैयारी कर ली थी। विभा ने उसकी बैग में दो चिवडा और मठरी के पैकेट्स रख दिएं और कहा, "मोटू! रात को भूक लगेगी न, तब मुझें याद कर खा लेना " यश बोल पड़ा, " तुझे याद कर? फिर तो हो गया मेरा बंटाधार! एक टुकड़ा भी मेरे मुँह में नहीं पहुंचेगा! यही बकासूर की खाला...सब गटक देगी!"

सब फिर हँसने लगे। वीणा को भी बड़ा मज़ा आ रहा था उनकी नोंक-झोंक सुनने में। वज्र कुछ बोलता उसके पहले ही वीणा बोल पड़ी, " देख भाई! अपुन की पार्टनर को कुछ नहीं बोलने का! समझा न!" सभी उसकी बात पर हँसने लगे! वज्र बोल पड़ा, " यार यश! यह यश का 'मुंबईयां वर्जन' कब लॉन्च हुआ? " सभी पेट पकड़ कर हँसने लगे। वैदेही तो सीधी पेट पकड़ कर वॉशरूम की तरफ चली गई। 
हँसी के फव्वारों के बिच तनाव-चिंता के बादल हवा हो चुके थे। वसंत की दस्तक से उपवन में नई ऊर्जा प्रविष्ट हो चुकी थी। डाली-डाली हवा के झोंकों के साथ नर्तन कर रही थी...फूल महक रहे थे साथ में मित्र-मण्डली भी!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।