3539435394modify नवल आसझरझर झरती पात, ग्रीष्म ऋतु की मनमानी।नवल सृजन की आस, सृष्टि की रास सुहानी।।पतझड़ खिलते फूल, सुरभि का साज तराना~प्रकृति करे उपकार, भावना हो नित दानी।।चंचल जैनLabelDirected by द्वारा चंचल जैनShared14 Apr 2025Start14 Apr 2025End14 Apr 2030 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंनवल आस© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें