वो पहला प्यार
✍️ कवि – विजय शर्मा एरी (Vijay Sharma Erry)
वो पहला-पहला एहसास था,
न कोई वादा, न कोई प्यास था।
बस उसकी एक मुस्कान थी,
और दिल मेरा बेक़रार सा था।
लखनऊ की उन भीगी गलियों में,
जब साथ चलते थे सावन की टहनियों में।
उसके रुख़ से उठती थी ताज़ी बयार,
जैसे मौसम खुद ले आया हो बहार।
हम साथ पढ़ते थे, किताबों में खो जाते,
अक्सर एक-दूजे की कॉपी में दिल बना जाते।
कभी एक सवाल पर बहस भी होती,
पर मैं हारकर भी उसकी जीत पर मुस्कुरा जाता।
बग़ीचे की उन ख़ूबसूरत कलियों के बीच,
हमारी हँसी गूंजती थी धीरे-धीरे खींच।
कभी झूले पर, कभी पेड़ के नीचे,
उसका नाम कानों में पड़ते ही मन हिचके।
वो मुझे चिढ़ाती, मैं नाराज़ हो जाता,
फिर उसका "सॉरी" कहना, जैसे दिल बहला जाता।
हर रूठने में एक मीठा सा प्यार था,
हर मान जाने में एक गहरा इकरार था।
वो बारिश की बूंदें, और उसकी भीगी ज़ुल्फ़ें,
उस पल के आगे क्या कोई तोहफा तौल सके?
कभी बोरियत में भी वो बगिया बन जाती,
उसकी बातें मेरे दिन को रातों तक सजाती।
प्यार तो आज भी है, पर वैसा मासूम नहीं,
अब भावनाओं में भी थोड़ी सी दूरी रही।
पर उस पहले प्यार का स्वाद कुछ और था,
बिना कहे सब कह जाना, वो दौर और था।
अगर आपके दिल में भी बसी है कोई पहली मोहब्बत की मीठी याद,
तो कमेंट में ज़रूर लिखिए — वो पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जाता।
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