माँ!
माँ!
नमन माँ शारदे! 🙏🙏
द्विगुणित सुंदर छंद :
12 12 पदान्त दो गुरु

माँ तेरे चरणों में, स्वर्ग हमारा जानो,
विनती नटखट बच्चा, करता है अब मानो।
तेरे आँचल सी है, कहाँ छाँव बतलाओ।
क्षीर-नीर का मीठा, कहाँ पात्र समझाओ।।

पोछो आँसू मेरे, जादू कर में तेरे।
तुम समझो बिन बोले, मन की पीडा मेरे।
जग झूठा, तुम सच्ची, जननी ममता-ढाणी।
है भाग्योदय मेरा, तू हीरे की खाणी।।

तेरे आगे बौनी, इन्द्र लोक की आभा।
तुम प्रतिमा बिन खाली, मन मंदिर का गाभा।
विपदा में माँ प्यारी, अस्त्र-शस्त्र तुम भारी।
शक्तिस्वरुपा माँ, खल संहारक न्यारी।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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  • आप से जुड़ कर, कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा!🙏❤️🙏❤️🙏