ये प्यार ही to ज़िन्दगी...
ये प्यार ही to ज़िन्दगी...

भाग ८७

आबा  और प्रतिभा जी के पहुँचते ही आजी की आँखें चमकने लगी। वज्र भी घर पर ही था। भोजन वगैरा निपट कर आबा आराम कर रहे थे और प्रतिभा जी अपनी बैग से खाने-पीने का सामान निकाल रही थी कि आजी ने फिर वैदेही की बात छेड़ी। आजी भावुक हो कर कहने लगी, " विनु! तुझ्या वडिलांची इच्छा कधी पूरी करणार रे बाबा? ते तर गेले.. मी आहे तो पर्यंत तरी वज्र चं लग्न... "
तभी आबा बोल पड़े" आई! अस नको ग बोलू!"

आबा सच्चाई जानते थे। वज्र की ज़िन्दगी का क्या भरोसा? कैसे कहूँ शहिद की विधवा को ?लेकिन आजी ज़िद पकड़ कर बैठ गई मैं जिन्दा हूँ तब तक.. बहु के रूप में वैदेही को देखने दे! वज्र भी बहुत चाहता हैं उसे! मेरा कहा झूठ लगता हैं तो पूछ ले उसे! वज्र खामोश था। सबकी बातें गौर से सुन रहा था तभी प्रतिभा जी बोल पड़ी, " क्या गलत कह रही हैं माँ? उसके जैसी समझदार लड़की इस घर को स्वर्ग बना देगी जी।"

आबा ने देखा दोनों सास-बहु इस मामले में एक हो गई थी
तो आगे कुछ कहने का रास्ता ही बन्द था। वज्र मन ही मन खुश था। वैदेही उसके रोम-रोम में बस चुकी थी। उसे पूरा विश्वास था अगर वैदेही उसकी जीवनसंगिनी बन कर आई तो सत्यवान की सावित्री की तरह यमराज से भी भीड़ कर उसकी उम्र बढ़ा लायेगी! उसे पता था आजी फ्रंट पर खेल रही हैं तो 'येनकेन प्रकारेन' गोल तो करेगी ही।

सभी आपस में चर्चा कर ही रहे थे और फाटक के सामने गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई। आजी समझ गई, माँ-बेटी आ चुकी हैं। उसका मन ख़ुशी के मारे उछल रहा था। दरवाजा खुला था। आबा उनका इंतज़ार ही कर रहे थे। आते ही वैदेही तथा जानकी जी ने सबको प्रणाम किया और वज्र ने जानकी जी के पैर छुएं।

वैदेही ने विदेशी ग्राहक के जानकारी की फाईल आबा के हाथ में दी। आबा ने फाइल के कुछ पन्ने खोल कर देखे! जिस तरीके से वैदेही ने सभी दस्तावेजों तथा जानकारी को समेट कर फाइल बनाई थी उसे देख कर आबा बहुत खुश हुए। उन्हें 



अपने चुनाव पर गर्व महसूस हो रहा था।

तभी आजी बोल पड़ी, " अन्नपूर्णा! चहा कर ग पोरी! " जानकी जी ना-नुकुर करने लगी लेकिन आजी ने उसे शांत किया। वज्र और वैदेही उठने लगी लेकिन आजी ने उन्हें यहीं रुकने को कहा।

आबा की व्यापार की बात ख़त्म होते ही आजी व्यवहार की बात करने लगी। वह बिना लाग-लपेट के सीधे मुद्दे पर ही आई। " विनु! मी काय म्हणते, दोन्ही एक दुसऱ्याला पसंद करतात, हो कि नाहीं वज्र-वैदेही? मग कोणाची वाट पहायची? करूँ या कि "शुभमंगल सावधान " काय रे पोरां नो?

दोनों क्या बोलते? यहीं तो चाहते थे वो! हमेशा के लिए एक-दूजे से जुड़ना! आजी ने सीधे-सीधे वैदेही से प्रश्न किया, " वैदेही! वज्र पसंद आहे न तुला? वैदेही क्या बोलती? वह शर्मा कर बोल पड़ी, "आजी तुम्ही पण न... और माँ के पीछे छुप गई मानों नन्ही, नटखट बच्ची! अब आजी ने वज्र का रुख किया। वज्र बोल पड़ा," आजी! तुझ्या मर्जी विरुद्ध जायची हिम्मत आहे का तुझ्या वज्र ची? "

यहाँ तो मामला सेट हो चूका था तभी वैदेही बोल पड़ी,
" मग आई? आई ला कोण बघणार? "
बिच में ही प्रतिभा जी बोल पड़ी, " वैदेही! आम्ही आहोत न!" माँ की चिंता मत कर! हम सब हैं न उसके लिए!"

वैदेही अब खुल गई थी। उसने आई की तरफ देखा! माँ ने सबको प्रणाम करने का इशारा किया। वज्र भी मुस्कुरा रहा था। आबा अपनी माँ की चलाखी और व्यावहारिकता पर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। कितनी आसानी से बडे से बडे प्रश्न का हल ढूंढ़ लेती हैं माँ! यहीं बात समझकर भी मैं नहीं बोल पाया था इतने दिनों तक और माँ ने चार दिन में ही सारी पहेली सुलझा दी। दोनों परिवार बहुत खुश थे। आजी ने वज्र-वैदेही को कमरे में जाने का इशारा किया और सभी भविष्य की योजनाएं बनाने में व्यस्त हो गएं।

आजी और प्रतिभा जी का विचार था, एकलौता बेटा है, धूम-धाम से शादी करेंगे लेकिन आबा इसे एक साधरण समारोह की तरह करना चाहते थे। उन्होंने जानकी जी के भी विचार जानने चाहे लेकिन उन्होंने कहा, " जैसा आप उचित समझें!"

जानकी जी अभिभूत थी। इतने बड़े घर में वैदेही की शादी होने जा रही थी। न दहेज का लालच था ससुरालवालों को न कोई शर्त! सभी जाने-पहचाने लोग! सालों से एक-दूसरे के पडोसी! एक-दूजे के सुख-दुःख के संगाती! सबसे महत्वपूर्ण और विशेष बात यह थी कि था तो यह प्रेम- विवाह लेकिन दोनों परिवारों की रजामंदी तथा आशीर्वाद से सुनियोजित विवाह के रूप में परिवर्तित हो गया था।

आबा ने जानकी जी को सही मुहूर्त देख कर वज्र और वैदेही की सगाई की तारीख निश्चित करने की बात कही। सभी से सलाह-मशवरे के बाद कार्यक्रम को सिर्फ कुछ नजदीकी लोगों तक सीमित रख कर सम्पन्न करने का निर्णय लिया गया। जानकी जी और वैदेही चाहती थी कि फिजूलखर्ची करने के बजाय उस रकम को दोनों के भविष्य के लिए सुरक्षित किया जाय।

सिर्फ दिखावे के लिए पैसे को पानी की तरह बहाने का क्या मतलब? उसी पैसे को रचनात्मकता से, कुछ सोच समझ कर खर्च किया जाय तो कम से कम वह पैसा वर-वधु की ज़िन्दगी तो संवार सकता है। वज्र और वैदेही दोनों यहीं चाहते थे। परीक्षा को सिर्फ एक महीना ही बचा था। एक सगाई का छोटा सा कार्यक्रम घर में ही रख कर परीक्षा के बाद रजिस्टर मैरिज करने का विचार दोनों ने व्यक्त किया।

आजी, आबा, प्रतिभा जी सिर्फ अपने बच्चों की खुशियाँ चाहते थे। दुनिया तो क्या दोनों तरफ से बोलती है। जो हमारा मन कहें वहीं सही। अंतिम निर्णय यहीं लिया गया कि पचास से ज्यादा लोग नहीं होंगे समारोह में। सिर्फ मित्र मण्डली तथा उनके परिवार के दो सदस्य, गाँव के प्रतिष्ठित दस महानुभाव तथा अण्णा, जानकी जी का परिवार जिसमें रात दिन उनको काम में मदद करने वाले, घर में साथ रहने वाले सदस्य भी शामिल होंगे।

आजी आज बहुत खुश थी। उसने प्रतिभा जी को वैदेही की ओटी भर कर, हल्दी-कुंकुम लगा कर, श्रीफल, साड़ी ब्लाउज पीस देने को कहा और सबका लड्डू खिला कर मुँह मीठा किया। दो मिनट ठहरने को कह कर वह अपने कमरे में गई और एक बॉक्स लेकर आई। उसमें चाँदी की माता लक्ष्मी, सरस्वती और बिच में विघ्नहर्ता की मूर्ति थी। जैसे ही वैदेही ने सब के पैर छुएं, आजी ने वह मूर्ति वैदेही को देते हुए कहा, "हा आजोबांचा आशीर्वाद आहे पोरी.." और उनकी आँखें नम हो गई।

जानकी जी गदगद थी। उन्हें श्री की बहुत याद आ रही थी। जानकी जी की नम आँखें देख वैदेही माँ की पीड़ समझ गई थी। उसे भी पापा बहुत याद आ रहे थे । वह माँ को लिपट गई। दोनों एक-दूसरे के आँसू पोंछ रही थी और साथ में रो रही थी। जानेवाला तो देश पर कुर्बान हो कर चला गया था और परिजनों को कभी न भर पानेवाला घाँव दे कर अलविदा कह गया था। सभी की आँखें नम थी। दर्द पलकों से उतर कर गालों पर ठहर गया था।

जानकी जी और वैदेही को वज्र ड्राइवर को साथ ले जा कर घर छोड़ आया था। वज्र कपडे बदल कर सोने चला गया। आबा और प्रमिला जी सफ़र से थकी हुई थी। वो भी बिस्तर पर पड़ते ही नींद के बाहुपाश में  जखड़ गएं। एक आजी ही थी जो चांदनी में आजोबा से बातें कर रही थी। आज आजोबा भी ख़ुशी से आजी के लिए सितारों से सजी वेणी लेकर खड़े थे और आजी शरमा रही थी बिल्कुल वैसे ही जैसे बासठ साल पहले.....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....


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