आहिस्ता- आहिस्ता....
आहिस्ता- आहिस्ता....

काँटों से सजी सेज पर, 
मुस्कुराने का हुनर ....
सीखा हैं हमने आहिस्ता-आहिस्ता!

अपनों के दिए ज़ख्मों पर,
नमक का कहर ,
सहा हैं हमने आहिस्ता-आहिस्ता!

बसंत में पतझड़ का दीदार ,
बुढ़ापे की टूटती कग़ार  ....
लाँघी हैं हमने आहिस्ता-आहिस्ता!

दुनिया की रंग बदलती अदा पर,
चहकने का जिग़र  ..... 
पाया हैं हमने हमने आहिस्ता-आहिस्ता !

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |



इस पर लोग क्या कह रहे हैं