ए प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ४८
ए प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ४८
भाग ४८

कल तक आशंकाओं के बादलों से  घिरा विभा का मन भविष्य के स्वर्णिम फलक पर अंकित होने वाले अध्याय को पढ़ने की कोशिश कर रहा था! विभा के मन में आशाओं के बीज पनप रहे थे। देश के लिए जी-जान दांव पर लगा कर, समर्पित हो कर खेलने की कल्पना मात्र से ही वह उत्साहित थी। निरन्तर बहती नदी की जलधारा की तरह सभी अवरोधों को पार कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए आगे-आगे बढ़ते रहना कोई आसान काम तो था नहीं! जीत के लिए साथ-साथ दौडते प्रतिस्पर्धियों के बीच से आगे निकल कर प्रतिस्पर्धा में अग्रणी स्थान प्राप्त करना कोई बच्चों का खेल तो था नहीं! 
भागीरथ प्रयत्नों से ही मंजिल हासिल होती है यह वह बखूबी जानती थी। वह खुद को और यश को भाग्यशाली समझ रही थी कि नितिन सर ने दोनों को इसलिए चुना था कि उन्हें देश के लिए खेलने का मौका मिल सकें! भविष्य के गर्त में छुपे असंख्य जगमगाते ग्रह-नक्षत्र-तारे उसे आकर्षित कर अपनी आभा से मंत्रमुग्ध कर रहे थे। दो पाटों के बीच बहती नदी सा दोनों मित्रों को एक-दूसरे से दूर रह कर प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा, खुद के खेल को विश्व मानकों पर खरा उतारना होगा, बेहतर बनाना होगा, खूब पसीना कोर्ट पर बहाना होगा और अलग-अलग प्रतियोगिताओं में भाग लेकर खेल को तराशना होगा, यह चुनौती वह स्वीकार चुकी थी लेकिन यश से दूरियाँ... यह कल्पना ही अंदर तक खाई जा रही थी। सपनों को यथार्थ में बदलने के लिए इतना मूल्य तो चुकाना ही पड़ेगा न? 

एक-दूसरे के प्रोत्साहन, विचार-विमर्श, व्यंग-कटाक्ष, सलाह-सुझाव, टीका-टिप्पणियों के बिना कैसे जी पाएगी वह? इसी चिंता ने विभा के मन में मायाजाल बुन लिया था। वह किंकर्तव्यविमुख हो मायाजाल में मकड़ी की तरह फंसी थी लेकिन सुनहरे भविष्य की कल्पना ने पल में उसे उजाले की और ले जाने का अट्टहास किया!

विभा ने यश को फ़ोन कर तैयार रहने के लिए कहा और 'ओला' बुक कर वह यश को साथ ले कर कॉलेज के बैडमिंटन कोर्ट पहुँच गई। 

नितीन सर ने आज बाकी खिलाडियों को भी बुलाया था! आज वह आगे के स्पर्धाओं के लिए एक योजना बनाना चाहते थे! बैडमिंटन एकल के लिए विभा का चुनाव हो चूका था लेकिन महिला युगल स्पर्धा के लिए उन्हें विभा के साथ जोडीदार का चयन करना था ताकि भविष्य में वह उसे सही ट्रेनिंग दे सके तथा दोनों में बेहतर तालमेल की कोशिश कर सके। 

खेल सिर्फ खेल ही नहीं होता उसमें कई आयामों पर विचार करना पड़ता हैं। सही तकनीक, उच्च गुणवत्ता के संसाधन, बेहतरीन प्रशिक्षण, अटूट लगन, जिद्द, जीवट और जद्दोजहद जरुरी होता हैं।

यश और विभा जब मिक्स युगल मैच खेलते तो दोनों का तालमेल बहुत ही उम्दा होता था! यश को जहाँ शॉट्स मारने में तथा उठाने में महारत हासिल थी वहीं विभा नेट पर खेलने में निष्णात! दोनों की सर्विस में कमाल की विविधता थी और दोनों सर्विस में ही कई अंक हासिल कर लेते थे लेकिन अब हालत बदल चुके थे। उन्हें खेल के मैदान में नई जोड़ी बनानी होगी यह वो भी समझ चुके थे। 

ज़िन्दगी भी कितनी अजीब होती हैं! पल में दो अनजान लोगों को मिला भी देती हैं और पल में एक-दूजे से अलग भी कर देती हैं! कल तक बैडमिंटन खेल जगत में मिल कर अपना जलवा दिखाने वाले अब अलग-अलग अपनी आभा बिखेरेंगे! मंजिलों की ऒर बढ़ते कदमों के निशान मील के पत्थर बन राह को आलोकित करेंगे और नव पल्लव को संजोएंगे, संवारेंगे।

यश को विभा के चेहरे की उदासी खटक रही थी! कहाँ आग उगलता, लाल फूलों से लदा पलाश और कहाँ यह उदासी का नकाब ओढ़ खूंट सा खड़ा पलाश! 
यश बोल पड़ा, " हाय मिस यूनिवर्स! हम शोक सभा में नहीं आए हैं, बैडमिंटन खेलने आएं हैं! मेरी मुरझाई गुलाब की कली! क्या बात हैं? मैं पैरालिंपिक में स्थान पाने के लिए जा रहा हूं, इस दुनिया से नहीं... और तू कौनसी इतनी आसानी से मेरा पीछा छोड़ने वाली हैं? यमराज लेके भी गया तो तू भूतनी बन कर उसकी भी गर्दन पकड़ लेगी...कल तक तो बड़ी-बड़ी बातें कर रही थी...अपने दोस्त को पैरालिंपिक में पोडियम पर मेडल पहनते हुए देखना चाहती हूं... वगैरा... वगैरा...तो फिर यह सन्नाटा क्यों हैं भाई? दोस्त को ऐसे विदा करोगी चयन प्रक्रिया में भाग लेने के लिए.. माय 'बोल्ड & ब्यूटीफुल' स्वीट हार्ट? 

विभा की आँखों से मोती झरने लगे! उसने यश का हाथ पकड़ कर चुम लिया लेकिन चेहरा पीछे मोड़ दिया! ये कम्बख्त आँसू... अक्सर राज खोल देते हैं! यश ने उसका माथा चूमा और बोल पड़ा, "विभा! यार! तुम मेरी ताकत हो! सपना पूरा करना हैं तो कुछ कुर्बानी तो देनी होगी न? मेरे गुलाब! साथ हो तब तुम्हारा रंग, रूप, सौरभ मुझें ऊर्जा देता हैं! जब सशरीर साथ नहीं होगी तब तुम्हारी स्मृतियों की किताब के पन्नों के बीच छुपाया ये सूखा गुलाब मेरा हौसला बढ़ाएगा! हमारे रास्ते भले ही अलग हो गएं हैं, लक्ष्य तो वो ऊँची चोटियाँ  ही हैं जहाँ हमें जीत का ध्वज फहराना हैं! 
विभा संभल चुकी थी! पथ को अवरुद्ध करने वालें अवरोधों से हमेशा लक्ष्य बड़ा होता हैं जब वह राष्ट्र की आन-बान-शान से जुड़ा होता हैं!
नितीन सर ने दोनों को आधे घण्टे बाद घर आने के लिए कहा और सर निकल गएँ! विभा और यश ने दूसरे खिलाडियों के साथ भी प्रैक्टिस की! कुछ नए खिलाडी भी प्रतिभाशाली थे! दो दिन बाद सर ने सब को चयन के लिए बुलाया था! सभी का खेल देख कर ही उनका प्रतियोगिता में चयन तथा खेलना निश्चित होने वाला था! विभा ने प्रैक्टिस में सब का खेल गौर से देखा था! वह भी अब चुनौती देने के लिए तैयार थी! 
मन को कड़ा कर उसे अब सिर्फ खेल पर ध्यान केंद्रित करना था! खेल के कोर्ट में उतरते ही उसे सिर्फ बैडमिंटन की रैकेट और कॉक ही दिखाई देता था। आसान नहीं था राष्ट्रीय स्तर पर खिलाडी का चयन होना! अब स्पर्धा सिर्फ कॉलेज स्तर पर नहीं राष्ट्रीय स्तर पर थी! हर क्षेत्र में ध्यान देना जरुरी था! इक तरफ संतुलित तथा पौष्टीक आहार, दमख़म में वृद्धि का प्रयास तो दूसरी तरफ समय का प्रबंधन, निरन्तर अभ्यास जरुरी था! सभी अच्छे तथा सफल खिलाडियों के विडियो देख कर उनकी बारिकियों को समझना तथा आत्मसात करने की कोशिश करना जरुरी था तो दूसरी तरफ स्पर्धा में जिनसे भिड़ना हैं उनके खेल का अवलोकन करना, उनकी खामियों तथा खासियतों पर विचार करना भी अनिवार्य था ! बहुत कुछ करना जरुरी था जिसके लिए तन-मन की एकाग्रता और सतत प्रयास का कोई दूसरा विकल्प नहीं था! खेल जगत में ध्रुव तारा बन चमकना हैं तो कठोर तप जरुरी हैं! भागीरथ प्रयास के बिना कैसे लाएंगे गंगा धरा पर? कैसे बुझेगी माँ भारती की तमगों की प्यास? 

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में..


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