प्रीत....
 प्रीत....

मनहरण घनाक्षरी में,सादर समीक्षार्थ...

तुम प्रीत, तुम गीत,

सखा श्याम, मन मीत,

कान्हा संग कैसी जीत,

बन्धन सारे हटे!

कालिंदी किनारे रास,

भीगी-भीगी मन आस,

मुरली में राधा वास,

प्यासी ही रैना कटे !

काहे खेले लुका-छुपी,

छीने वस्त्र कर्म रूपी,

खोले भाग्य मोक्ष कुप्पी ,

रसिया राधा रटे!

विष्णु अवतार श्याम,

पीड़ हरे हरि नाम,

धर्म रक्षा मुख्य काम,

कुकर्म लेखा घटे!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!
  • लाजवाब ❤️🙏❤️🙏❤️
  • बहुत अच्छा लिखा है