ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५२
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५२

भाग ५२

'युवा स्पंदन' कार्यक्रम की प्रेरणा तथा कल्पना माननीय प्रधानमंत्री जी की ही थी। उनका मन युवाओं की आत्महत्या से बहुत व्यथित था। वो जानते थे कि एक माँ का जवान बेटा-बेटी, जिसे कई कष्ट उठा कर उसने पाला-पोसा हो, उसका आत्महत्या कर इस दुनिया से चले जाने से कितना दुःख होता हैं! सभी को अपने लाडले, संवेदनशील प्रधानमंत्री जी का इंतजार था और समय के पाबंद प्रधानमंत्री जी मंच पर उपस्थित हो गए। युवा दिलों की धड़कनें तेज हो गई और सभी उनके स्वागत में नारे लगाने लगे। प्रधानमंत्री जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में हाथ हिला कर उपस्थितों तथा सहयोगियों का अभिवादन कर युवाओं का अभिनन्दन कर अपना स्थान ग्रहण किया। 

प्रधानमंत्री जी देश की युवा शक्ति को देख आनंदित तथा अभिभूत थे। वो जानते थे इन्ही के हाथों में इस देश की प्रगति का 'अशोक चक्र' हैं। यहीं हैं देश के भविष्य के शिल्पकार जिनकी ज़िद, जीवट, जिजीविषा और जद्दोजहद ही देश को विश्व में ऊँचा स्थान दिला सकती हैं।  युवाओं की ऊर्जा ही वह सौर ऊर्जा हैं जो स्वाभाविक रूप देश को निरन्तर आगे बढ़ने की शक्ति दे सकती हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई। प्रधानमंत्री जी को दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति जी ने अभिवादन कर दीप प्रज्वलित करने के लिए आमंत्रित किया और माँ शारदे को प्रतिष्ठापित कर कार्यक्रम की शुरुआत हुई। अब सम्मान तथा प्रशस्तिपत्र वितरण का कार्यक्रम शुरू हुआ। एंकर ने उद्घोषणा की, " वीर शहीद श्री जाधव जी की पुत्री वैदेही जानकी जी जाधव, 'राष्ट्रीय स्लोगन प्रतियोगिता ' की प्रथम पुरस्कार विजेता, कृपया मंच पर पधारे और अपना सम्मान ग्रहण करें "
तालियों की गड़गडाहट के बीच वैदेही मंच पर उपस्थित हुई! प्रधानमंत्री जी ने उसे पीठ पर थपकी देकर पुरस्कार प्रदान किया। उनकी थपकी उसके लिए पिता का आशीर्वाद था। उसने उनके चरण छुएं और सम्मान ग्रहण कर वह मंच से नीचे उतर ही रही थी कि एंकर ने उसे दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया और अपना स्लोगन भी दोहराने को कहा!

वैदेही वैसे तो कई बार मंच पर विचार व्यक्त कर चुकी थी लेकिन इस बार उसे कुलपति जी, प्रधानमंत्री जी के सामने बोलना था। उसने अपनी मुस्कुराहट बिखेर कर वक्तव्य शुरू किया। सभी मान्यवरों को अभिवादन कर वह बोलने लगी। उसकी धाराप्रवाह वाणी सबको मंत्रमुग्ध कर रही थी। सभी विशेष अतिथि उसका वक्तव्य ध्यान से सुन रहे थे। उसने कई सवाल उठाये। 
वैदेही ने अपना स्लोगन दोहराया, "हारना मंजूर हैं, जीवन से हारना मंजूर नहीं.." वह आगे बोल पड़ी, " नीली छतरी वाले के इस अनमोल उपहार को क्यों असमय व्यर्थ गवाऊँ? उसने अपनी मित्र-मण्डली का उदाहरण दिया और कहा कि आज इस जीवन संघर्ष का एक उदाहरण आपके सामने हैं! मैं और मेरे मित्र! मैं विनती करुँगी उन्हें कृपया खड़े हो जाईये! हम सभी मौत से संघर्ष कर खड़े हैं जीने के लिए, अपने जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के लिए! हार हमारे अभियान की पहली सीढ़ी हो सकती हैं मगर अंतिम नहीं! मैं सभी महानुभावों का ध्यान इस तरफ खींचना चाहूंगी कि आखिर क्यों जिस संस्था में छात्र अपने सपनों को नया आयाम देने, नए अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने, क्षितिज की नई ऊँचाईयों को छूने जाता हैं वह लक्ष्य से भटक कर क्यों आत्महत्या का रास्ता चुनता है, इस पर समग्र विचार आवश्यक हैं। हम इस तरह प्रतिभा को स्वाहा होते नहीं देख सकते। देश के स्वर्णिम अध्याय को लिखने में सक्षम युवाओं का इस तरह मौत को गले लगाना देश, समाज और परिवार के लिए बहुत बड़ी क्षति हैं। इसे हर स्तर पर रोकने की कोशिश होनी ही चाहिए। आईएँ! अपना दुःख-सुख मित्र, स्नेहिजनों से साँझा करें और यमराज को गरिमामय तरीके से विदा करें! जयहिन्द!"

पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा और वैदेही मंच से उतर कर माँ के पास बैठ गई। मंच से जाने से पहले माँ का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ी वैदेही ने सभी उपस्थितों के दिलों में जगह आरक्षित कर दी थी। प्रधानमंत्री जी ने भी चेहरे पर मुस्कान ला कर उसे आशीर्वाद प्रदान किया था।

यश, वज्र, विभा, वैदेही और जानकी जी इन अनमोल पलों को कैमरे में कैद करने में लगे हुए थे। जानकी भी फोटोग्राफी में माहिर थी। उन्होंने एक वीडियो भी उतारा था। सभी बहुत खुश थे। जिस तरह से वैदेही ने अपनी बात अपने बेबाक अंदाज में रखी, प्रधामनंत्री जी भी कुछ पल अवाक उसे देखते रह गए! सरकार के मुखिया के सामने, शिक्षा क्षेत्र के कर्ता-धर्ता के सामने उनकी कमियों को गिनाने के लिए अद्भुत हौसले की जरुरत होती हैं जो कि एक शहीद की बेटी में था।

आजकल सच कहने के लिए ही तो हिम्मत की जरुरत होती हैं। झूठ तो लठ्ठ लेकर चौराहे पर मुंछो को तांव देकर अपने चमचों के साथ खड़ा नज़र आता हैं और सच मुँह झुपाएं यहाँ-वहाँ भटकता दृष्टीगोचर होता हैं। 

अब प्रधानमंत्री जी का सम्बोधन शुरू हुआ। सभी ध्यान देकर उसे सुन रहे थे। उनकी भाषण शैली बहुत ही रोचक तथा प्रभावी नज़र आ रही थी। कौन श्रोता हैं यह समझ कर उन्हीं की ज़िन्दगी के उदाहरण दे कर अपनी कड़वी लेकिन देशभक्ति से ओतप्रोत बात कहने में उन्हें महारत हासिल हैं यह उनकी शुरूआती पंक्तियों को सुनकर ही समझ आ गया था। हँसी के फव्वारों के बीच व्यंगात्मक शैली में उन्होंने अपनी बात रक्खी। प्रधानमंत्री जी ने देश के लिए युवा कितने महत्वपूर्ण हैं यह भी समझाया और अंत में यह भी कहा कि मृत्यु अटल सत्य हैं लेकिन मरना एक कला हैं और मरना ही हैं एक दिन तो क्यों न देश के लिए मरें?

कार्यक्रम व्यवस्थित और समयबद्ध तरीके से सम्पन्न हुआ। मित्र-मंडली के लिए यह जीवन का अद्भुत, अविस्मरणीय तथा अतुलनीय अनुभव था। सभी विजताओं ने अपने-अपने विचार संक्षेप में लेकिन दिल की गहराईयों से साझा किएं। राष्ट्रगीत 'जन गण मन' गाने के बाद कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। 

प्रधानमंत्री जी अपनी आदत के अनुसार आगे की पंक्ति में बैठे अतिथियों से मिले। उन्होंने वैदेही को व्यक्तिगत रूप बधाई दी और उसने भी चरणस्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया। प्रधानमंत्री जी की  मिलनसारिता से सभी अभिभूत थे। युवाओं के सामने एक ऐसा आदर्श नेता उपस्थित था जिसमें भारतीय संस्कृति की समझ, संस्कार और संवेदनशीलता कूट-कूट कर भरी हुई थी। उनका हर एक शब्द मानों युवाओं की माथे की लकीर थी जिसे लिखने की क्षमता देश का यह मुखिया रखता था।

प्रधानमंत्री जी के साथ सभी गणमान्य व्यक्ति अब प्रस्थान कर चुके थे और दूसरे विशाल दरवाज़े से अब उपस्थित जन समूह जिसमें छात्र, अभिभावक, शिक्षक सभी शामिल थे हॉल से बाहर निकलने लगे। कोई एक दूसरे से परिचित हो रहा था तो कोई किसी का मोबाइल नंबर दर्ज कर रहा था। बहुत से उपस्थितों ने वैदेही को बधाई दी, आशीर्वाद दिया। 

जानकी जी भी आज बहुत आनंदित थी। उन्हें बार-बार श्री की कमी खल रही थी। कल्पना की रंगबिरंगी पतंगे नील गगन में उड़ रही थी और जानकी जी उन्हें अपलक निहार रही थी! पवन का एक झोंका आता और सभी को यहाँ-वहाँ ले जा कर छोड़ देता। कुछ पल थरथराती पतंगे फिर स्थिर होने की कोशिश करती और हवा के साथ डोलने लगती। तभी एक पतंग कट गई और डगमगाती, हवा के साथ डोलती नीचे की ऒर आने लगी और दूसरे ही पल एक पेड़ की घनी डालियों में अटक गई। जानकी जी ने एक आह भरी और वैदेही का हाथ पकड़ कर गेस्ट हाउस की तरफ चलने लगी... मित्र-मण्डली के साथ कदम से कदम मिलाते हुए...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में.. …

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • वाह वाह! बहुत खूब! सुन्दर प्रस्तुति!
  • मनमोहक शब्दों से बयाँ करते सुन्दर ! बधाई
  • बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! बधाई!
  • क्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️