ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ७५
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ७५
भाग ७५

ज्वालामुखी के भीतर उबलते लावा सा विभा के दिल के अंदर क्रोध उबल रहा था। पीड़िता मानसिक और शारीरिक संत्रास भुगत रही थी और अपराधी खुलेआम घूम रहा था। बेचता तो वह फूल था लेकिन अपने स्वार्थ के लिए, अपनी वासनापूर्ति के लिए कोमल कलियों को मसल रहा था और सभी मुक-दर्शक बने हुए थे। विभा के बागी तेवर उसे धिक्कार रहे थे लेकिन उसकी खामोशी ही महासागर में आनेवाले तूफ़ान के पहले की शान्ति थी।
आज डॉक्टर की अपॉइंटमेंट थी और कॉलेज ख़त्म होने के बाद वो, यश और लाली डॉक्टर के यहाँ जाने वाले थे।

विभा का मन अंदर ही अंदर उसे कचोट रहा था। वज्र को मैं अपना नजदीकी दोस्त मानती हूँ तो क्यों छुपा रही हूँ उससे मैं अपनी समस्या? उसका मन उसे खाएं जा रहा था। 

हमेशा की तरह गुलमोहर तले उसने वज्र और वैदेही को बैठे देखा तो वह बोल पड़ी, " सॉरी वज्र! कल कुछ ज्यादा ही तनाव तथा दुविधा में थी तो तुमसे बात न कर पाई। मेरे दोस्त! बुरा मत मानना! कल क्या गुजर रही थी दिल पर! कैसे बताऊँ तुम्हें" कह कर उसने वज्र को लाली की पूरी दास्तां बताई। 

वज्र कुछ पल के लिए सुन्न हो गया फिर कुछ सोच कर बोला, " विभा! हम दोस्त हैं! एक-दूसरे को करीब से जानते हैं, एक-दूसरे की नब्ज़ पहचानते हैं। आज डॉक्टर से जरूर मिलो लेकिन एक सुझाव था। वैदेही की माँ जानकी जी को भी साथ ले जाओ! वैसे भी 'तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा' से बेहतर हैं जानकी जी जैसी अनुभवी और निडर महिला को साथ ले जाओ। उनकी तुम्हें हर जगह मदद ही होगी। 

यश को भी यह प्रस्ताव ठीक लगा। वज्र ने जानकी जी को फ़ोन कर नाश्ता वगैरा कर कर तथा लाली जिसे विभा कॉलेज जाने के पहले वहाँ छोड़ आई थी उसे भी खा-पी कर तैयार रहने को कहा! 

अप्पा ने डॉक्टर से विस्तार से बात कर दी थी। डॉक्टर, वकील इनसे असलियत छुपाने का खामियाजा पीड़ित को ही भुगतना पड़ता हैं यह वह जानते थे। उन्होंने सभी सबूत, रिपोर्ट्स को गोपनीयता से संभाल कर रखने को कहा था। लाली की सभी जरुरी जाँच करने को भी कहा था और अंत में उन्हें यह भी विश्वास दिलाया था कि जो भी खर्च होगा, वह स्वयं उसका भुगतान  करेंगे।

आप्पा राजनीति के मंझे हुए खिलाडी थे। वो जानते थे राजनीति में सिर्फ अच्छाईयां ही काम नहीं आती बल्कि कभी-कभी चाणक्य नीति अपनाना भी आवश्यक होता हैं। उन्होंने मित्र-मण्डली को स्पष्ट निर्देश दिए थे, खास कर विभा को कि कोई भी कदम जल्दबाजी में, भावुकता से तथा उनसे सलाह-मशवरा किए बिना न उठाएं!  कभी- कभी छोटी सी गलती की बड़ी भारी कीमत चुकानी पडती है यह बात वह अच्छी तरह जानते थे। 

यश, विभा, लाली तथा जानकी जी डॉक्टर के पास पहुँच चुके थे। कुछ समय के इंतज़ार के बाद उनका क्रम आया। डॉक्टर ने सब को बाहर भेज पहले सिर्फ लाली से बात की। पहले तो लाली कुछ घबरा रही थी लेकिन बाद में वह खुल गई और सारी हकीकत बयाँ कर दी।

अब डॉक्टर केस को पूरी तरह समझ चुकी थी। उन्होंने सभी सैंपल इकठ्ठा कर उन्हें प्रयोगशाला में भेज दिए और लाली को कुछ नाश्ता वगैरा करने को कहा। बाद में डॉक्टर ने जानकी जी से बात की। उन्होंने उन्हें बताया कि लाली पिछले एक महीने से शारीरिक संबंधों के जाल में फंसी हुई थी। हम कोई जोखिम उठाना नहीं चाहेंगे क्योंकि यह नाबालिग का केस है! हमें उसके गर्भाशय की थैली को साफ़ करना होगा ताकि गर्भधारणा की संभावना ख़त्म हो। उसके लिए जो टेस्ट जरुरी हैं उसके लिए सभी नमूने इकठ्ठा कर लैब में भेज दिए गएं हैं। कल रिपोर्ट आ जाएगी उसके बाद की अपॉइंटमेंट दे कर मैं आगे का काम सफलतापूर्वक कर दूंगी। बच्ची छोटी हैं। उसे अपनी मूर्खता की कुछ कीमत तो चुकानी ही होगी। कुछ समय तक उसे दर्द सहना होगा लेकिन जो मुख्य चिंता थी उसे आपके सही समय पर लिए गए फैसले ने दूर कर दिया हैं। बाकी बात मैं अप्पा से कर लुंगी। 

जानकी जी का तनाव भी कुछ हद तक कम हो गया था लेकिन उन्हें लाली की चिंता सता रही थी। उन्होंने विभा से भी खुल कर बात की। एक मन तो हो रहा था कि लाली की माँ को बुला लिया जाय लेकिन लाली की विरोध दर्शाती तीव्र प्रतिक्रिया देख कर सभी ने उस विचार को ख़ारिज कर दिया। 

विभा ने अप्पा से बात कर ली थी। वो कल शाम तक मुम्बई पहुँच रहे थे। सबको अप्पा की डांट तो खानी ही पड़ेगी यह निश्चित था लेकिन लाली को आगे की दर्दनाक ज़िन्दगी से बचाया जा सकता यह जानकर सभी कुछ हद तक चिंता-मुक्त हो गए थे।

लाली जंगल में रास्ता भूल कर असमंजस में भटकती माँ से बिछड़ी हिरनी सी जंगल में भटक रही थी। उसे अपनी गलती का एहसास भी हुआ तो बहुत देर से। मुम्बई की चकाचौंध वाली ज़िन्दगी का मोह उसे ऐसी खाई में गिरा चूका था कि वहाँ से खुद को संभाल कर लड़खड़ाते-लड़खड़ाते बाहर निकलना नामुमकिन तो नहीं मगर मुश्किल जरूर लग रहा था। 

भला हो अप्पा का जिन्होंने मुश्किल घड़ी में अपने आश्रितों का साथ नहीं छोड़ा बल्कि उनका सहारा बन उनके पीछे मजबूती से खड़े हो गए! यहीं उनकी भलमानसियत थी जिसने उन्हें गाँव वालों के दिलों के आसमान में ध्रुव तारे सा अटल स्थान दे दिया था। 

सभी कुछ हद तक तनाव से राहत पा कर सामान्य व्यवहार में व्यस्त ही गए थे लेकिन विभा का बागी मन आक्रोशित था, बेचैन था। वह मन ही मन विचार कर रही थी, गलती अगर दोनों की हैं तो सजा सिर्फ एक को क्यों मिले? सम्भोग का आनन्द लेने में, मजे करने में अगर दोनों भागीदार थे तो कीमत सिर्फ एक ही क्यों चूका रहा हैं? अगर इस तरह अपराधी समाज में मदमस्त हाथी सा अहंकार में घूमता रहेगा कि कोई उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता तो कल किसी और को वह शिकार बनाएगा इस संभावना को हम कैसे ख़ारिज कर सकते हैं? आखिर दोनों के गुनाह में शामिल होने के बावजूद सजा अगर सिर्फ नाबालिग को मिले तो क्या फायदा समाज और व्यवस्था के कानून का? 

सवालों के असंख्य सर्प फन ताने विभा के मस्तिष्क में तांडव कर रहे थे और विभा उनसे मुँह चुरा यहाँ-वहाँ भाग रही थी। अप्पा का इंतज़ार था। उन्हीं के पास विभा के सवालों का समाधान था। 

विभा को शाम को खेलने के लिए जाना था। वह जाते-जाते फूलवाले का हिसाब चूकता कर जाना चाहती थी, महीने भर की फूलमालाओं का भी और कोमल कली को मसल कर फेंक कर बेशर्मी से मुस्कुराने का भी मगर अप्पा की चेतावनी उसे रोक रही थी। उसने स्कीम के बहाने उसके आधार कार्ड की कॉपी हासिल कर दी थी। उसके जागृत मन में उबल रहा लावा बार-बार उफन कर, बाहर निकल कर अपराधी फूलवाले को तबाह करने को उतावला हो रहा था लेकिन विभा सब्र कर रही थी जो उसके लिए, उसके जैसी बिनधास्त और निडर लड़की के लिए बेहद मुश्किल काम था....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


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