नारी सशक्तिकरण : व्यवधान या वरदान?
नारी सशक्तिकरण : व्यवधान या वरदान?
विश्व का मौजूदा माहौल हमें अंतर्मुख कर बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर रहा हैं! 
क्यों विश्व की आधी से अधिक आबादी दो वक्त की रोटी के लिए तरस रही हैं, अत्याचार से कराह रही हैं और तथाकथित महाशक्तियाँ खामोश बैठ कर तमाशा देख रही हैं, आपसी संघर्ष तथा युद्ध के लिए उकसा रही हैं! जगह-जगह से आ रहा शरणार्थियों का हुजूम आखिर किस बात की ओर इशारा कर रहा है? 
रशिया, युक्रेन के बीच का रक्त-रंजित संघर्ष हो या इजराईल और हमास के बिच का युद्ध, एक तरफ घातक, विध्वंसक हथियारों की होड़ को प्रदर्शित कर रहा हैं तो दूसरी ओर संवेदनाविहीन महाशक्तियों की पोल खोल रहा हैं!

मानवता के लिए परीक्षा की घड़ी आई हैं और पूरे विश्व की नारीशक्ति के लिए यह चुनौतीभरा समय हैं! इस कठिन वक्त में धैर्य और ढाढस की अग्निपरीक्षा होगी और यह इम्तिहान नारीशक्ति को, मानव जाति को देना ही होगा क्योंकि युद्ध हो या आतंकवाद, अन्याय हो या अत्याचार, उत्पीड़न हो या शोषण, समूचे विश्व में नारी तथा बच्चें ही हैं जो इसके आसान भक्ष्य बनते हैं, आतंकियों के सुपाच्य ग्रास बनते हैं फिर समस्या चाहे मानव निर्मित हो या प्राकृतिक! भूख से बिलखते बच्चे, खून से लथपथ पति, पिता, भाई और कहीं असहाय, हवस की शिकार महिलाओं, बच्चियों को देख नारीशक्ति की भूमिका का महत्व कई गुना बढ़ जाता हैं!

अपना अस्तित्व-परिवार-समाज और अपने देश पर विपदा आएँ तो महिलाएँ कैसे खामोश रह सकती हैं ? कैसे हालतों की तपिश से अनछुई रह सकती हैं? कैसे शराफत का मुखौटा लगाएँ, आँखें मुँद कर क्षीर-पात्र से दूध पीती बिल्ली सा, मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को अनदेखा कर सकती हैं?

एक तरफ मानव निर्मित तथा प्राकृतिक समस्याएँ अजगर सा मुँह फैलाएँ इन्सान और इंसानियत को निगलने को तैयार बैठी हैं और दूसरी तरफ अपनी जीवट, जिजीविषा और जद्दोजहद के बल पर आपदाओं से चार-चार हाथ कर, उनसे मुक्ति पाकर, गिर कर फिर जोश से उठ खड़ी शाश्वत मानवता की  धुरी नारी शक्ति को प्राची के मुखकमल को सुशोभित करते अरुणोदय का इन्तजार हैं!

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी की भूमिका का औचित्य और ज्यादा बढ़ गया हैं क्योंकि कोमलांगी ने तमाम अवरोधों को पार कर, चुनौतियों को धत्ता बताकर, उफनते दर्या में कश्ती को उतार कर, सफलतापूर्वक उसे मंजिल तक पहुँचाया हैं! 
आज भी विषमता, लिंगभेद, बंदिशें, रोक-टोक ए अवरोध, व्यवधान जारी हैं मगर नारीशक्ति ने अपने अदम्य साहस, अटूट इच्छाशक्ति और अक्षुण्ण प्रयासों के बल पर अपना लोहा मनवाया हैं और नारी सशक्तिकरण को मानवता के लिए वरदान साबित किया हैं !

अंतरिक्ष हो या रक्षा-क्षेत्र, शिक्षा हो या चिकित्सा का मामला, घर-गृहस्थी हो आपदा प्रबंधन, राजनीति हो या राजस्व, कृषि हो वाणिज्य, रणभूमि हो या कर्मभूमि, स्त्री-शक्ति ने अपनी समिधा अर्पण कर, तन-मन-धन को दाँव पर लगा कर अपनी काबिलियत, देशभक्ति और श्रेष्ठता को सिद्ध किया हैं!

नारी जितनी कोमल-ह्रदय, भावुक, संवेदनशील है, विपदा-आपदा में वह उतनी ही सशक्त, मजबूत, दृढ़निश्चयी और धैर्यवान बन कर उभरती है। बिना डरे, बिना रुके, वह डट कर विपत्ति का सामना करती है।

विश्व की आधी आबादी आज भी अपने आत्म-सम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं! बेशक़ महिलाओं ने आज रक्षा के क्षेत्र में झंडे गाड़ दिए हैं, अंतरिक्ष की टोह ले ली हैं, चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी निस्वार्थ सेवा और समर्पण से आतंकियों को भी घुटने टेकने को मजबूर किया हैं, विज्ञान तथा अनुसन्धान के क्षेत्र में अपनी अद्भुत प्रतिभा और धैर्य का परिचय दें कर देश का ध्वज विश्व में फहराया हैं लेकिन आज भी दुनिया का बहुत बड़ा तबका अपने जीवनयापन के लिए बेहतर परिवेश, स्वच्छ जल, सुरक्षित पर्यावरण तथा समुचित संसाधनों की आस लगाए बैठा हैं, यह सोच कर कि एक ना एक दिन वह स्वर्णिम सुबह जरूर आएगी!

आपने अपने बच्चे की जान बचाने के लिए खूंखार शेर का मुकाबला करती माँ को देखा होगा! अपने पति को आतंकवादियों की गोलियों से बचाने की खातिर बिना हथियार के भी उसके सामने खडी होकर उसे धिक्कारती, ललकारती 'रणचंडी' का दीदार खबरों में ही सही किया होगा! आम दिनों में सामान्य सी दिखने वाली नारी दुष्ट-मर्दन के लिए कब अष्टभुजाधारी, महिषासुरमर्दिनी बन जाती है, कोई समझ सका है भला?

आत्महत्या कर चुके पति के नाम का कुंकुम कपाल पर सजा कर, दुधमुँहे बच्चे को पल्लू से बाँध कर, मिट्टी से सोना उगलती किसान की पत्नी 'लक्ष्मीबाई' हो या लाशों से पटी युद्धभूमि पर, फटे बुर्के से बच्चे को छुपाकर, दूध पिलाती माँ 'रेहाना' हो या जेल में विचाराधीन कैदी के रुप में बरसों से सड़ रहे पति का ठेला संभालती पत्नी 'कौशल्या' हो या कत्ल किए जा चुके कश्मीरी पंडित की नववधू, जीवनसंगिनी 'प्रिया' क्यों न हो, आज भी नारी की घर-बाहर, गली-कूचे, सड़क-चौराहों, कार्यस्थल-पर्यटन स्थल, संसद-विधायिका में अपनी अस्मिता, अपना आत्म-सम्मान बचाने के लिए जंग, प्रतिस्पर्धा, संघर्ष अनवरत जारी हैं!

'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' मनाओ या पखवाड़ा या जिंदगी भर नारी को पूजने का दंभ भरो... विश्व में कहीं भी जाओ, "ढाक के तीन पत्ते"!
इंदिरा गाँधी, किरण बेदी, द्रोपदी मुर्मू, सुनीता विल्यमस, दीपा मलिक, विनेश फोगाट, मेरी कॉम, शीतल देवी जैसी अपवाद स्वरूप मर्दानियों तथा काली घटाओं के बिच चमकती कुछ सौदामिनियों को छोड़ दो तो आज भी आम महिलाएँ उपेक्षा, भेदभाव, तिरस्कार की शिकार हैं! आज भी कोई 'रानो' खेतो में बैलों की जगह जोती जा रही है तो कोई 'चिन्नमा' बीड़ी कारखाने में मैनेजर की वासना भरी नजरों का सामना कर रही है! कहीं कोई नाबालिग 'मिष्टी' अपनी मालकिन के जुल्म को ख़ामोशी से सह रही है तो कहीं कोई 'भंवरी' दहेज़ के लिए जलाई जा रही है! कहीं कोई नौकरीपेशा 'रोजी' अपने वरिष्ठ अधिकारी के अश्लील इशारों को झेल रही है तो कहीं कोई 'माखी' डायन कह कर प्रताड़ित की जा रही है, कहीं कोई 'माला' पुरुषप्रधान सामंती सोच की बली चढ़ रहीं है! कहीं कोई कमला बार-बार बेटियों के जन्म पर भ्रूण हत्या के लिए उकसाई जा रही है तो कहीं कोई 'बेला' कुपोषण के कारण बच्चे को जन्म देते-देते काल के गर्त में समा रही है!

जब तक महिलाएँ खुद अपना महत्व, मूल्य, औचित्य नहीं समझेगी, खुद को सक्षम, सबल, सशक्त नहीं बनाएगी, कुछ नहीं बदलेगा! वक्त के बदलते साँचे में ढल कर उसे खुद को काबिल बनाना होगा! दुष्ट प्रवृत्तियों का सामना करना होगा, बिना किसी श्रीकृष्ण के मदद की उम्मीद लिए!
शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक स्वतंत्रता, सक्षमता के बल पर नारी स्व-रक्षा, स्वाभिमान तथा इन्सानियत का परचम उतुंग हिमशिखरों पर लहरा कर निराशाजनक परिस्थितियों में भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अपनी उपयोगिता, सार्थकता और समर्थता साबित कर सकती हैं बशर्ते उसका खुद में अटूट विश्वास हो , अथक प्रयास के लिए वो सदैव तैयार हो तथा असीम संकल्पशक्ति की वह धनी हो! तभी वह अपने सशक्तिकरण को व्यवधान नहीं  वरदान साबित कर पायेगी।


स्वलिखित एवं मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र!


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