ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ६७
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ६७
भाग ६७

मित्र-मण्डली की परीक्षा की तिथियां नजदीक आ रही थी और सभी को अपनी-अपनी तैयारी करनी बाकी थी। वैसे तो यह टीम पढाई के मामले में नियमित थी। जहाँ तक हो सकें मित्र-मण्डली सभी लेक्चर्स को ध्यान से सुनते थे, नोट्स भी लेते थे। नियमित रूप से पढ़ाई भी करते थे। उन्हें पता था कि किसी न किसी कारण से उनकी छुट्टियाँ होगी ही। 

वैसे तो महाविद्यालय के प्रधानाचार्य से लेकर साधारण कर्मचारी तक भी उन्हें बहुत सहयोग करते थे। उन्हें खेल स्पर्धा के समय ऑनलाइन ट्यूटोरियल में सहभागी होने की अनुमति भी दी गई थी ताकि वो अभ्यासक्रम में न पिछड़े और उनका नुकसान न हो। 

मित्र मण्डली अपनी उपलब्धियों से महाविद्यालय का नाम रोशन कर रही थी। यह भी सर्वविदित था कि मित्र मण्डली ने अपनी उपलब्धियों के बलबूते कभी अनुशासनहीनता का कार्य नहीं किया न सुविधा का गैरवाजिब फायदा उठाया तो फिर उन्हें इतनी सुविधा मिलना तो उनका हक़ बनता था न! 
कॉलेज को अपने इन छात्र-छात्राओं पर गर्व था। विभा और यश जहाँ क्रीड़ा क्षेत्र में महाविद्यालय का नाम रोशन कार रहे थे वहीं वैदेही, वज्र विविध क्षेत्र में अपनी बहुमूल्य उपलब्धियों से कॉलेज का नाम चमका रहे थे।

आज ही यश और विभा की अंतिम सेमिस्टर की तारीखें आई थी। सभी गुलमोहर तले इकठ्ठे हुएं थे। वसंत ऋतु का खुमार गुलमोहर पर छाया हुआ था। लाल-पिले रंगों के सुन्दर फूलों से वृक्ष पटा हुआ था। हरी-भरी पत्तियों के बीच ये लाल-पिले फूल मन मोह रहे थे। खुशनुमा बयार के झोंके से कुछ फूल धरा पर गिर कर यहाँ-वहाँ बिखर रहे थे। 

विभा के बालों पर पड़ी गुलमोहर के फूलों की पंखुड़ियाँ देख यश बोल पड़ा। " ब्यूटी क्वीन! देखा... गुलमोहर तुम पर पंखुड़ियाँ बरसा कर तुम्हारा स्वागत कर रहा हैं । उसे पता हैं, यह 'लाइफ-टाइम' मेंबर हैं। इसे पढ़ना-लिखना तो हैं नहीं भले ही इम्तिहान नजदीक क्यों न हो!'
तभी विभा बोल पड़ी, " सब तेरे जैसे थोड़े ही होंगे। जम गए तो दही बनकर वहीं जम गएं सालों-साल! जयपुर से भगाया तभी तो यहाँ आया न! अब यहाँ से नहीं भगाएंगे तब तक यहीं कुण्डली मार कर बैठेगा न तू? सारा स्पोर्ट्स का आरक्षित धन यहीं चट कर जायेगा! सफेद चूहा कहीं का... हाँ... वो करणी माता मन्दिर का..सफेद चूहा! 
वो क्या कहते हैं वहाँ सफेद चूहें कों मन्दिर में? हाँ! काबा ...काबा!
यश कहा छुप बैठने वाला था! वह बोल पड़ा। 
"अरे झाँसी की रानी! किस्मतवाली हैं कि तुम्हें काबा के दर्शन हुएं! नटखट बच्ची! तेरी सारी मनोकामना पूरी होगी! तथास्तु! " 
दोनों का वार्तालाप सून सभी हँसने लगे। अब वज्र ने मोर्चा संभाल लिया। वह सबके सामने अपना दिल खोल कर रखने लगा। 

"यार! एक  जमाना ऐसा भी था जब कहते थे....

" पढोगे लिखोगे तो बनोगे नबाब, खेलोगे, कूदोगे तो होंगे ख़राब"

भारत के लिए यह ऐसा वक़्त था जब इक्का-दुक्का मेडल हमारी झोली में आता था और हम फूले नहीं समाते थे। अब खेल की नीति भी बदल चुकी हैं और नियति भी। 
आज भारतीय खिलड़ियों ने अपना लोहा मनवा दिया हैं ओलिंपिक और पैरालिम्पिक खेलों में! यह एक सुखद परिवर्तन ही कहा जाएगा न! अब विभा और यश कों ही देखो! कहीं रत्तीभर भी कम हैं क्या वो?
खेल के कारण ही बुद्धि भी तीक्ष्ण होती हैं, ग्रहण शक्ति में वृद्धि होती हैं यह तो भूल ही जाते हैं हम और हमारे अभिभावक ! 

बहुत कुछ सीखाता हैं खेल जीवन में। सबसे महत्वपूर्ण हैं संघर्षक्षमता। अंतिम क्षण तक हार न मानने की प्रवृत्ति। सबको साथ लेकर जीत को अपनी ओर खींचने का जज़्बा। क्या विभा और यश कों देख कर यह साबित नहीं होता?

वज्र बोलते जा रहा था और सभी उसे ध्यान से सुन रहे थे। अपनी बात को तर्क और उदाहरण से समझाने में, अगले से अपनी बात मनवाने में वज्र का कोई सानी नहीं था। वह बोलता ही जा रहा था...

अब जमाना बदल चूका था। खेल के लिए शिक्षा संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण के साथ-साथ अनेकों सुविधाएं भी दी जा रही थी। खेल की तरफ युवा पीढ़ी की रूचि बढ़     रही थी और साथ-साथ अभिभावक भी जीवन में खेल का महत्त्व समझ रहे थे। 
तभी वैदेही ने सभी का ध्यान घड़ी की ऒर खिंचा। कल लाइब्रेरी में मिलने का वादा कर सभी घर की तरफ निकल पड़े। 

मित्र मण्डली इस मामले में बड़ी किस्मत वाली थी। गाँव की खुली हवा में खेलकूद कर बडे हुए ये बच्चें न चुनौतियों से डरते थे न जरासी मुश्किलें आते ही हथियार डाल देते थे। अवरोध तो उन्हें हाथ का मैल लगता था। पढ़ाई उनके लिए बोझ नहीं बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी का अनिवार्य हिस्सा थी। पढाई के वक़्त पढ़ाई और मौजमस्ती के वक़्त मौजमस्ती। दिन का कम से कम एक घंटा पढ़ाई के लिए देना उनकी आदत बन चुकी थी। खेल के कारण विभा और यश के जीवन में एक अनुशासन भी आ गया था। समय की कद्र करना मित्र-मण्डली बहुत अच्छे से जानती थी। 
उनके परिवार के बढ़े-बूढ़े लोगों का आचरण और व्यवहार ऐसा था कि जिसे देख उन्हें अच्छे संस्कार मिले थे।
बड़ों की सेवा तथा इज्जत करना वह जानते थे।

आज यश के पिताजी न्यूयार्क से वापस अपनी मातृभूमि को लौट रहे थे। महीने भर की यह यात्रा भले ही उनकी व्यापारिक हितों के लिए की गई यात्रा थी लेकिन उन्होंने अपने मित्र को मियामी जाकर मिल कर, कुछ दिन वहाँ ठहर कर, उसके साथ वहाँ के पर्यटन स्थलों को देख कर, इस यात्रा को बहुआयामी तथा बहुउद्देशीय बना दिया था। 

विभा और यश उन्हें लेने 'छत्रपति शिवाजी महाराज अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे' पर जाने वाले थे। वज्र और वैदेही घर पर ही रुके थे क्योंकि आबा के पहचान के लोग आने वाले थे वज्र से मिलने और सांत्वना देने। आबा की गैरहाजरी में सब रीति-रिवाज, परम्पराएं सँभालने का दायित्व वज्र पर आ चूका था। जानकी जी तथा वैदेही भी उन्हें सहयोग दे रही थी।

वज्र ने यश को फ़ोन कर कहा था ड्राइवर और गाड़ी साथ ले जाने को लेकिन यश की खुद्दारी उसे इन बातों को करने से रोकती थी। 
फ्लाइट समय पर मुम्बई लैंड हो चुकी थी। यश ने फ़ोन कर पापा से कहा था कि वह और विभा एयरपोर्ट के प्रवेशद्वार पर उनका इंतज़ार कर रहे हैं। 

यश के पिता बहुत खुश थे कि उनका बेटा उन्हें लेने आया हैं। कोई अपना अपने आने का इंतज़ार कर रहा हैं यह कल्पना ही इस भाग-दौड़ की ज़िंदगी में कितनी सुकून देती है न! 

मशीनी जिंदगी और भौतिक सुख-सुविधा से हट कर जब इन्सान मानसिक सुख शान्ति की तलाश में भटकने लगता हैं तब उसे अपनी विशेषताएं नज़र आने लगती हैं। हर भारतीय को विदेश से लौटने के बाद भारतीय संस्कृति में रिश्तों के महत्व को दर्शाते अनमोल पृष्ठ की कीमत और भी ज्यादा तीव्रता से महसूस होती हैं। 

यश के पापा महीने भर में ही मानों 'होम सीक' हो गए थे। भला हो उस मित्र का जिसकी वजह से उन्हें कुछ घर सा माहौल और परिवार का साथ मिला। आखिर अपनी जन्मभूमि के आँचल सा प्यार-दुलार कहाँ मिलेगा?  भारत की धरती पर कदम रखते ही वह उल्हास और उमंग से भर गए!  उन्होंने यश को गले लगाया और विभा से बातें की। दोनों ने उनके चरण छूँ कर आशीर्वाद लिया और ओला बुक कर घर की ऒर निकल पड़े। 

बातों-बातों में पापा ने वैदेही और वज्र के बारे में पूछा तो यश और विभा ने आबा के पिताजी के चिरप्रयाण की बात कहीं और वैदेही और वज्र के न आने का कारण भी बताया। विभा को घर छोड़ बाप-बेटे दोनों निकल पड़े अपने घर की ऒर एक नए अध्याय का शुभारम्भ करने....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...

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