भाग ७४
विभा द्वन्द में फंस गई थी। एक तरफ न्याय की गुहार लगाने की मंशा तो दूसरी तरफ एक नाबालिग कमसिन कली का भविष्य जिसने अभी-अभी सूर्यकिरणों के दर्शन कर अपनी नन्ही-नन्ही आँखें खोली थी दुनिया को अपलक निहारने के लिए !
कलियुग में सच का साथ देना ही तो मुश्किल हो गया हैं इस दुनिया में, समाज में! आज के हालात में अपराधी को सजा दिलाने का मतलब है बरसों कोर्ट के चक्कर कांटना, हर दिन, प्रतिपल मर-मर कर जीना, निर्लज्ज पुरुषप्रधान व्यवस्था की चौखट पर नाक रगड़ना अपने ही हाथों अपनी अस्मिता के चीथड़े-चीथड़े कर पीड़िता होने के बावजूद अपराधी सा छुप-छुप कर जीना और अंत में थक कर केस को वापस लेना।
विभा जानती थी अपराधी तो मूँछ पर तांव देकर घूमेगा, पीड़िता को डराएगा-धमकायेगा, हर पल उसे अपनी असहायता का एहसास कराएगा, उसकी भावनाओं का मज़ाक उड़ाएगा, उसकी संवेदनाओं को तोड़-मरोड़ कर कूड़ेदान में फेंक देगा और समाज हँसेगा नन्ही सी कोमल कली पर, जो खिलने से पहले ही धोकाघडी और जालसाजी का शिकार हो गई थी।
विभा ने एक निर्णय तो पहले ही ले लिया था कि लाली को महिला प्रसूति चिकित्सक के पास ले जा कर उसका 'चेकअप' कराना है। वह यह नहीं समझ पा रही थी कि कैसे बात को गोपनीय रख कर लाली की ज़िन्दगी को महफूज़ रक्खा जाय और अपराधी की लगाम भी कसी जाय!
शाम को उसे बैडमिंटन की प्रैक्टिस के लिए महाविद्यालय के बैडमिंटन कोर्ट पर जाना था। उसने लाली को वैदेही के यहाँ छोड़ा और वह यश के साथ चली गई खेलने! एक बार उसके मन में आया क्यों न जानकी जी से बात कर सलाह लूं? दूसरे ही पल उसके मन में यह विचार आया क्यों न अप्पा से बात करूँ? आज नहीं तो कल उसे अप्पा से बात तो करनी ही पड़ेगी! कब तक सच को छुपा पायेगी वह? किस-किस सवाल का जवाब तलाशेगी वह अकेली ?
विभा भविष्य के अंधेरों के सायों से ही सिहर गई। क्या गुजरेगी एक विधवा माँ के दिल पर जब वह अपनी बेटी की नादानी की पूरी कहानी सुनेगी? क्या प्रतिक्रिया होगी उसकी? किस तरह वह पीड़ा से कराह उठेगी और आकाश-पाताल एक कर देगी चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बेटी पर?
विचारों के बवंडर से बाहर निकलने का वह जैसे-जैसे प्रयास करती, वह और-और उसमें उलझती जाती।
यश और वह कोर्ट पर खेल तो रहे थे लेकिन यश महसूस कर रहा था कि आज उसकी ' झाँसी की रानी ' का ध्यान खेल में बिल्कुल नहीं हैं। नितीन सर ने भी उसे दो बार टोंका! यश उसके चेहरे को पढ़ने में माहिर था। एक मैच गँवाने के बाद यश ने उसे एक तरफ बुलाया और उसे खोद-खोद कर पूछने लगा। विभा का चेहरा बोल रहा था कि कुछ न कुछ हुआ हैं जो विभा के दिल में कांटे सा चुभ रहा है। आखिर तन से कांटा निकाले बगैर चैन कैसे आएगा?
अब यश ने क्रोध का सुदर्शन चक्र चलाया! "ठीक हैं 'ब्यूटीफुल'! तूँ मुझे दोस्त समझती ही नहीं न! मत बता क्या समस्या है! आज से तेरी-मेरी दोस्ती ख़त्म!"
विभा पर यश का यह अंतिम दाँव सटीक बैठा। वह भड़भड़ा कर गिरी पत्तों की इमारत सी टूट कर बिखर चुकी थी। वह यश के सामने सब कुछ उगल गई!
यश का गुस्सा सातवें आसमान पर था लेकिन वह जानता था यह समय जोश में आने का नहीं, ठन्डे दिमाग से सोचने का, निर्णय लेने का हैं। उसने सब से पहले विभा को लाली के चेकअप के लिए ले जाने को कहा और अप्पा से बात कर, सही सलाह लेकर आगे बढ़ने को कहा। लाली को किसी भी हालत में अकेला छोड़ने को साफ़ मना किया और उसे वैदेही और वज्र के घर छोड़ने की सलाह भी दी।
विभा ने जैसे ही यश को सारा किस्सा बता दिया, उसके मन से असह्य बोझ उतर गया था। अब वह ध्यान देकर खेलने लगी। सच ही तो कह रहा था यश! दोस्ती में यह पर्दा किस लिए? जहाँ दिल खोल कर नहीं रख सकते वह दोस्ती कैसी? समस्या को सही जगह साँझा करने से सही समाधान पाने का मौका भी तो मिलता हैं। फिर यह हिचकिचाहट, दुविधा किस लिए?
विभा ने खुद को धिक्कारा। विभा के खेल में अब फिर जान आ गई थी। विभा का संवेदनाशील मन लाजवंती सा कोमल था। जरा सा पराये स्पर्श होते ही खुद में ही सिमट जाता था। वज्र ने रात को अप्पा को फ़ोन लगाया। पहले तो हिसाब-किताब की बातें की फिर विभा को फ़ोन थमा दिया। विभा ने सारी बात बता दी। उन्होंने भी पहले चेक अप की बात की, उसे अकेला न छोड़ने को कहा और साथ में यश को लेकर डॉक्टर के पास जाने को कहा।
बाकी एक-दो दिन में वो मुम्बई आने वाले हैं कह कर उन्होंने फ़ोन रख दिया!
विभा अप्पा को जानती थी। उनका गुस्सा और ख़ामोशी का मतलब एक ही था। उसने आबा ने दिए नंबर पर कॉल कर उन्होने बताएँ प्रसूति तज्ञ की अपॉइंटमेंट ली और दोनों ने सुबह यश के साथ वहाँ जाने की तैयारी की।
वैदेही की माताजी जानकी जी लाली को देख समझ गई थी कुछ गड़बड़ हैं। रोज गुलाब के फूल सा खिला-खिला लाली का चेहरा आज मुरझाया सा, सूखा-सूखा नज़र आ रहा था। लाली की चंचलता, चपलता कहीं गायब हो गई थी और वह बार-बार छत की ऒर मुँह कर उस छिपकली को देख रही थी जो घात लगा कर कीड़े को निगल रही थी।
अनुभव की भट्टी में तपी जानकी जी ने सीधा विभा को सवाल किया, " विभा! क्या छुपा रही हो? कुछ समस्या हैं तो बताओ बेटी। लाली इतनी उदास क्यों हैं ? परसों तो इतनी उछल-कूद कर रही थी! आज क्या काली बिल्ली रास्ता कांट गई?"
विभा की आँखें बरसने लगी। उसे रोता देख लाली भी फूट-फूट कर रोने लगी। जानकी जी ने दोनों को थपथपाकर पानी पिलाया। वैदेही ने दोनों को 'जादू की झप्पी' दे विश्वास में लिया और लाली को रसोई से चाय बना कर लाने को कह कर विभा से सारी हकीकत को जानने का प्रयास माँ-बेटी करने लगी।
सभी चिंतित थी। समस्या ही ऐसी उलझी हुई थी। दोनों ने विभा को हिम्मत दी, लाली को प्यार से पुचकारा और कल डॉक्टर के पास जा कर आने के बाद आगे क्या करना हैं इस पर विचार करने को कहा। विभा और यश ने अप्पा से बात की यह जान कर उन्हें भी कुछ राहत महसूस हुई। दोनों जानकी जी को प्रणाम कर घर की ऒर बढ़ी।
विभा ने विघ्नहर्ता के सामने दीया जलाया। लाली भी पीछे हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई। अब उसे सिर्फ विघ्नहर्ता का ही सहारा था। जब सारे रास्ते अँधेरी गुफ़ा की ऒर ले जाते हो, आगे बढ़ने के सिवा कोई चारा न हो तो अपना सारा भार विघ्नहर्ता पर डाल निशब्द हो कर बैठ जाना चाहिएँ! समस्या का हल नीली छतरी वाले के पास ही तो हैं...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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