साँवरे की बाँसुरी की धुन बजी है
मन मयूरा नाचे की धुन में है बस
साँवली-सी मोहनी छवि रूप धारे
रासलीला देखने की धुन है बस
ख़ुद जहाँ पर आँख मूंदे हम खड़े हों
दर्जनों की भीड़ में आगे अड़े हों
गोपिकाओं संग कान्हा नाचते हों
राधिका के प्यार के ख़त बाँचते हों
क्या अजूबा, क्या छटा बिखरी हुई है
ख़ुद प्रकृति पहले से भी निखरी हुई है
रासलीला खेलने की धुन है बस
प्रेम का पंछी विचरने लग गया है
और अंदर से सँवरने लग गया है
श्याम के अधरों से नफ़रत हो चली है
बाँसुरी भी सौत सी होने लगी है
रूप अपना वार दूँ चरणों में उनके
और खुद को वार दूँ चरणों में उनके
सिर्फ़ उनका ही होने की धुन में है बस