आशीर्वाद!
 आशीर्वाद!

जिंदगी की गाड़ी कब मालगाड़ी के डिब्बो की तरह दौड़ते-दौड़ते पटरियां बदल चुकी थी पता ही नहीं चला! तीर से चुभते, जख्म देते शब्द, छुरी सी ह्रदय को छलनी करती नजर और तन-मन में नफ़रत का जहर घोलता स्पर्श अब दांपत्य जीवन का अभिन्न अंग बन चूका था! वास्तविकता के बवंडर में प्यार धूल के फूल सा चक्कर लगा लगा कर भरमा रहा था! जिंदगी टूटे आईने सी बिखरी-बिखरी थी... वक्त के घांव से रिसता दर्द बह-बह कर रीता हो चूका था और उम्मीदें मुरझाएँ फूलों सी सूख चूकी था! वह अपनी जिंदगी तो हार चुकी थी मगर बच्चो की जिंदगी प्रश्नचिन्ह सी आँखों के पानी में दिशाहीन पित-पर्ण सी तैर रही थी!

रोज घुट-घुट कर मरने से बेहतर था रिश्तों के मायाजाल से खुद को बाहर निकालना! उसने हिम्मत जुटाई और निकल पड़ी अपने दोनों बच्चो को लेकर पीहर की ओर! एक ही तो सहारा था उसका...एक ही आस!

चेहरे की मायूसी देख माँ-बापू जी ने लिफाफ़ा खोलने से पहले ही मजनूंन भाँप लिया था! आज उसके आने से न तो आँगन की चमेली महकी न पारिजात! मानो उसने कोई गुनाह कर दिया हो! भाई-भाभी भी नकली मुस्कान लिए धीरे-धीरे कान में कुछ फ़ुसफ़ुसाएँ और अंदर चले गए! कल तक दौड़ कर हाथ से थैला खींचने वाले भतीजा-भतीजी भी द्वार तक आएँ, मगर माँ का इशारा समझ कर खेलने चले गएँ! वह भारी मन से दीवानखाने में दाखिल हुई... बच्चों को बिस्किट देकर बाहर भेजा और मुरझाई सी सोफे पर लेट गयी!

इस बार मौसम खुशनुमा नहीं था! घर में स्मशान सी शान्ति थी! उसने मुशील से दो कौर हलक से नीचे उतरे और जैसे-तैसे भोजन पूरा किया, तभी माँ-बापूजी ने उसे कमरे के अंदर बुलाया...बेटी! अब हम थक गए हैं! तेरे भैया को तुम जानती ही हो न! बेचारा तेरी भाभी के सामने ऊफ़ तक नहीं कर पाता! कल कह रहा था उसके दोस्त की बहन ने खुदखुशी की अपने दो बच्चो के साथ! ससुराल से लड़-झगड़ कर आई थी! अब भाई किस-किस का बोझ उठायेंगा न ?चार रोज पहले उसकी शादी के लिए लिया हुआ कर्ज तो अभी उतरा ही नहीं था और आ गयी वह मायके मानों लौट के बुद्धू घर को आएं...भाभी ने साफ़-साफ़ कह दिया ....

वह तपाक से उठ खड़ी हुई! सूखे फूल सा मुरझाया चेहरा अब बिजली सा दमक रहा था! दबी-दबी सी आवाज अब शंखनाद बन गयी थी .......

बाबू जी! बहुत सताया न मैंने आपको! मगर एक बात कहूँ? मैंने अपने बच्चो को इस लिए बड़ा नहीं किया कि मैं एक दिन उन्हें रेल की पटरी पर सुला दूँ और खुद भी मौत को गले लगा लूँ ! डूबते को सिर्फ तिनके का सहारा चाहिए था बाबूजी! जरा सी हिम्मत...जरा सा हौसला! आखिर जिंदगी का दरया तो हर इंसान को खुद ही पार करना पड़ता है न? क्या आपने मुझे इस लिए पढ़ाया-लिखाया कि मैं कायर की मौत मरुं? किसके लिए मरुं? उसके लिए जो मेरी चिता को आग देने भी नहीं आएगा और चिता की रख ठण्डी होने से पहले ही सेहरा बाँध घोड़ी पे चढ़ जायेगा? मेरी जिंदगी की जंग मैं खुद लड़ूंगी बाबूजी! मैं आपकी मज़बूरी समझ सकती हूँ बाबू जी! मुझे तो बस आपका आशीर्वाद चाहिए बाबू जी!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!

इस पर लोग क्या कह रहे हैं