शीर्षक : हार जीत!
"जीवन की आपा-धापी में रंगमंच पर प्रस्तुतियाँ देनी पडती हैं! डोर भले ही ऊपरवाला खिंचता हो, दुनिया के सामने हर पात्र को अपना किरदार निभाना पडता हैं!
खेल-खेल में बीत जाएगी यह ज़िन्दगी, हर बार अपना बेहतरीन दाँव पर लगाना पड़ता हैं! जीत का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरना पड़ता हैं, भले ही नतीजा हमारे पक्ष में आएं या न आएं, मैदान में संघर्ष करना ही पड़ता हैं!"
मोटिवेशनल स्पीच में वक्ता धाराप्रवाह बोल रहे थे और रश्मि मन की परतों को हटा कर बार-बार अपने अंदर झाँक रही थी! हर बार सफलता उसको चिढ़ाती और उसके द्वार पर दस्तक दें कर लौट जाती! 'इंडियन आयडाल' में उसका चुनाव होना ही उसके लिए बड़ी बात थी! कितनी मेहनत की थी उसने! रात दिन बस उसी धुन में लगी रहती! न खाने पीने की सुधबुध, न कहीं घूमने जाने की चाहत! उसके लिए उसके माता-पिता ही सब कुछ थे! माता-पिता के प्यार के शामियाने तले वह खेलती-कूदती, रूठती-झगड़ती! कभी अपने माता-पिता को छोड़ अकेली नहीं रही थी वो तीन-चार महीनों तक! एक ही लक्ष्य था, 'इंडियन आयडल' में विजेता बनना!
रोज रियाज़ करते-करते थक कर चूर हो जाती पर आँखों के सामने वह ट्रॉफी घूमती रहती मानों अर्जुन की आँखों के सामने मत्स्य सन्धान! प्रतियोगिता में अपनी तैयारी के साथ-साथ खाने-पीने का परहेज भी करना पड़ता! मन को एकाग्र कर लक्ष्य का पीछा करना आसान थोड़े ही था?
उसके हमउम्र दस के दस प्रतिभागी भी तो इसी कोशिश में लगे थे!
धीरे-धीरे प्रतिभागी घटने लगे और स्पर्धा और ज्यादा मुश्किल होने लगी! टीवी पर 'लिटिल चैम्प' देख कर कभी एकांत में सुदूर बैठे भाई-बहन याद आते तो कभी माँ की याद मन को बेचैन कर देती! शाम को कभी-कभार पिताजी का फ़ोन आता पर घर के आँगन में खिले गुलाब की खुशबु को रश्मि तरस जाती! माँ के हाथ के खाने की कद्र तब समझ में आती और बार-बार डांट-डपट कर खाने को मजबूर करती माँ को याद कर आँखें भर आती! वह जानती थी कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता हैं! अपने परिवार, स्नेहिजनों को तो कुछ समय तो भूलना ही होगा न वरना कैसे पहुंचेगी वह लक्ष्य तक.. वह मन को समझाती और अपनी नई-नई सहेलियों संग बातों में दर्द को भूलने की कोशिश करती!
आखिर हम सफलता के महल देख कर कितने खुश होते हैं पर कौन जानता हैं इस महल की नींव में दफ़न पत्थरों को, अरमानों को, ख़्वाहिशों को, प्रयासों को?
रश्मि आज भोर में ही उठ कर बैठ गई थी! खिड़की से सूर्यदेवता के दर्शन कर वह तैयार होने लगी! आज सेमीफाइनल की रिकॉर्डिंग थी! जीत की सारी संभवनाओं के बिच वह कुछ पलों के लिए मायूस हुई लेकिन अगले ही पल उसने खुद को समझाया कि उसका काम हैं कोशिश कर स्पर्धा में अपना सर्वस्व दाँव पर लगा कर जीत के लक्ष्य को पाने के लिए अपना सर्वोत्तम देना! हार-जीत का क्या हैं, वह तो सफलता की पहली सीढ़ी हैं! हार भी होगी तो कुछ न कुछ सीखा कर ही जाएगी, अनुभव के गुल्लक में कुछ सिक्के डाल कर ही जाएगी! जीत का स्वप्न लेकर प्रस्तुति देना मेरा फ़र्ज हैं बाकि निर्णायकों के हाथ में हैं! हार का सामना करना पड़ेगा तो बहुमूल्य अनुभव की थाती लें घर जाऊंगी और फिर नए दमखम के साथ लौटूंगी! जीत गई तो नई जिम्मेदारियों को पेलने की कोशिश में जुट जाउंगी, अगली मंज़िल की ओर प्रयाण करुँगी! हार हो या जीत, हर बार win-win सिचुएशन ही रहेगी न!
यह विचार आते ही मन के आकाश में उमड़-घुमड़ कर आएं कजरारे अड़ियल बादल तितर-बितर हो गए और रश्मि आत्मविश्वास से मंच पर प्रस्तुति देने लगी! तालियों की गड़गडाहट के बिच वह प्रस्तुति देकर अपने स्थान पर लौट आई! उसके मन का कोरा फलक नीलाई से भरा हुआ था और श्वेत बादल रुई के फाहें से बिखरे हुए थे गगन में!
फाइनल में उसका चयन हो चूका था और उसका आत्मविश्वास सागर की नटखट लहरों की तरह हिलोरे मार कर किनारे को चूमने का अट्टाहास कर रहा था! अब वह हार-जीत के दायरों को तोड़ संगीत के महासागर में समा चुकी थी जहाँ सफलता-असफलता मायने नहीं रखती थी क्योंकि उसने संगीत के सुरामाओं के दिलों में ध्रुव तारे सी जगह बना ली थी!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!