हंसगति छंद-बचपन!
हंसगति छंद-बचपन!
नमन माँ शारदे 🙏🙏
हंसगति छन्द 11+9
4 4 (21), 324
2+2 समतुकान्त।

सपने सारे आज, हुएं हैं सच्चे।
चलो आज फिर बाग, बने हम बच्चे।।
मन में है उल्हास, बदन में ऊर्जा।
निर्मल अतिशय भाव, नहीं सिर कर्जा।।

बचपन का वह जोश, कहाँ हैं खोया।
माया-काया साथ, अधिक मनु रोया।।
तृष्णा का हो अन्त, मनुज बन ज्ञानी।
गो धन गज धन देख, लगे है पानी।।

मन की मन में आस, रहें जब सारी।
जीवन लगता बोझ, रात तब भारी।।
लम्बी रतिया देख, सजल है नैना।
बहते आँसू पोंछ, भूल जा रैना।।

बच्चा बन कर आज, सीख ले जीना।
जीवन विष है जाण, रोज है पीना।।
मनुज जनम अनमोल, पात्र तू बन्दा।
अपना कर  किरदार, तोड़ तू फन्दा।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं