भाग ९१
गुलमोहर की छाँव में सभी चबूतरे पर बैठे हुएं थे। गर्म हवाएं बह रही थी। सुबह के साढ़े दस बजे भी उनकी तपन महसूस हो रही था। गुलमोहर भी खामोश खड़ा था। न फूलों की बरसात न पत्तों की हलचल! पंछी भी डाल से नदारद थे। सब कुछ शांत-शांत!
यश का आज जन्मदिन था। बहुत दिनों बाद मित्र-मण्डली की कुण्डली में फिर से अच्छे दिन आएं थे! वैदेही, वज्र और विभा ने गले मिल कर यश को जन्मदिन की अनन्त शुभकामनाएं दी। तभी वीणा भी दौड़ी-दौड़ी आई। उसने यश को बुके दिया और हाथ मिला कर जन्मदिन की बधाईयाँ दी। आज उसे भी यश ने बुलाया था। मित्र- मण्डली इस नए दोस्त के आगमन से खुश थी। यश ने मित्र-मण्डली को आज भोजन के लिए घर पर बुलाया था।सभी आते ही निकल पड़े यश के घर की ऒर!
बंसी काका सब का इंतज़ार ही कर रहे थे। यश ने उनके पैर छूँ कर आशीर्वाद लिया और सभी सोफा पर बैठ गएं। विभा और वैदेही काका को मदद कर रही थी। उन्होंने पानी के ग्लास से भरी ट्रे बाहर ला कर टी-पॉय पर रख दी। बंसी काका ने आज केसर डाल कर सूजी का हलवा बनाया था। खाना बंसी काका ने घर पर ही बनाया था। आज उन्होंने राजस्थान का दाल, बाटी और चूरमा बनाया था। बंसी काका मूलत: राजस्थान के ही थे। दाल-बाटी-चुरमा बनाने में उन्हें महारत हासिल थी। साथ में गट्टे की सब्जी भी बनाई थी। बाटी उन्होंने घर में ही ओवन में बना दी थी। यश को लगता था पता नहीं यह राजस्थानी खाना सब को भाएगा कि नहीं लेकिन बंसी काका को पूरा भरोसा था कि सभी उंगलियाँ चाटेंगे। यश ने थोड़े चावल भी बनवा दिए थे ताकि कोई परेशानी न हो।
सभी के पेट में चूहें दौड़ रहे थे। केसर की सुगन्ध सब को दीवाना बना रही थी। बंसी काका ने डाइनिंग टेबल पर गुलाब के फूल सजा रक्खे थे। पितल के पुराने लोटे को पीताम्बरी से घिस कर उन्होंने सोने सा चमका दिया था। पानी से भरे इसी लोटे को उन्होंने फूलदान बना दिया था।गुलाब की खुशबू से सारा घर महक रहा था।
सभी खाना उन्होंने डाइनिंग टेबल पर सजा कर रख दिया। पास के टी-पॉय पर थाली , कटोरी, चम्मच और पानी के ग्लास। अब सभी को अपने हिसाब से खुद ही खाना परोस कर लेना था। सभी हाथ-पैर धो कर आएं और अब भोजन का श्री गणेशा करने ही वाले थे कि नितीन सर का फ़ोन आया। यश ने फ़ोन उठाया और बात करने लगा। सर ने उसे जन्मदिन की बधाई दी और कहा तुम्हारे लिए जन्मदिन का कीमती तोहफ़ा है। अभी दे दूँ! यश क्या कहता! नितीन सर ने कहा, " यश! तुम्हारा चयन हो चूका है। तुम्हें अंतिम सिलेक्शन के लिए पंद्रह दिन बाद लखनऊ जाना होगा। टिकिट आ गई है। कल शाम को मुझ से मिल कर ले लेना।"
यश ने मित्र मण्डली को खुशख़बर दी तो विभा तो उछल पड़ी। सभी ने यश को गले लगाया। नितीन सर ने उसे जन्मदिन का सुन्दर उपहार दिया था। सभी बहुत ही खुश थे। अब भोजन का मज़ा दुगुना हो गया था। सभी को बंसी काका के हाथ की दाल-बाटी बहुत पसंद आई। सूजी के हलवे का तो क्या कहना। चूरमे का स्वाद लेते-लेते मित्र-मण्डली अभिभूत हो गई थी। बहुत दिनों बाद एक अलग जायके का आनन्द लेते हुए मन प्रसन्न हो गया था। वीणा के लिए यह पहला मौका था मित्र-मण्डली के साथ जश्न मनाने का! उसे बड़ा मज़ा आ रहा था। तभी विभा बोल पड़ी, " मोटू! बिनधास्त खा हं! अपना ही माल है। आज तुम्हें छूट है। " सभी हँसने लगे! यश बोल पड़ा, " छूट मुझें है, फायदा तू उठा रही है ! मोटी हो जाएगी तो कोई जापानी थुलथुला सुमो ढूंढना पड़ेगा तेरे लिए!" सब फिर हँसने लगे। मित्र-मण्डली ने मिल कर उपहार स्वरुप उसके लिए लैपटॉप बैग और एक चाँदी का सिक्का लाया था। यश बहुत खुश हुआ। आज उसे मानों लॉटरी लग गई थी। सभी खाना खा कर आराम कर रहे थे। बंसी काका को भी यश ने साथ में ही भोजन करा दिया था। सभी ने उन्हें सब कुछ समेटने में मदद की।
अब सब की पेट पूजा हो चुकी थी। सभी रिलैक्स मूड में थे। यश ने वज्र और वैदेही को पास में बुला कर बिच में खड़ा किया और बोल पड़ा, " थ्री चियर्स फॉर वज्र एण्ड वैदेही! हिप...हिप.. हुर्रये!" दोनों शादी के बन्धन में बंधने जा रहे है। अब अगला उत्सव मनाएंगे वज्र और वैदेही के सगाई का! "
सभी उठ खड़े हुएं। सभी ने वज्र और वैदेही को शुभकामनाएं दी। विभा बोल पड़ी, " यार! ए तो बड़े छुपे रुस्तम निकले! नैनों से मिले नैन और हम तुम्हारे हो गए... चुपके...चुपके...चुपके...चुपके..."
सभी हँसने लगे। अब सब खा-पी कर सुस्ता गए थे। किसी का सोफा से उठने का मन नहीं था... तभी दरवाजे की बेल बजी। सभी एक पल के लिए खामोश हो गए। बंसी काका ने दरवाजा खोला और बोल पड़े, " बाबू जी आप! आईये दीदी! " और वो उनके हाथ से सामान लेने लगे। बाकी सामान ड्राइवर ने अंदर रख दिया था। यश ने अपने माता-पिता को प्रणाम किया और बाद में सारी मित्र-मण्डली ने भी उनके चरण छुएं!
यश बोल पड़ा," बाबू जी! फ़ोन करते तो लेने आ जाते न"
बाबू जी ने कहा, " फिर सरप्राइज कैसे होता? जन्मदिन मुबारक हो बेटा" और उन्होंने यश को गले लगाया! माँ को प्रणाम कर यश उनसे भी गले मिला और उन्हें सोफा पर बैठने के लिए कह कर सभी एक तरफ खड़े हो गए। बाबू जी ने सब को पास बुलाया और SUV की चाबी यश को थमा कर कहा, " यह तुम्हारे जन्मदिन का उपहार है बेटा! यश और मित्र-मण्डली देखते ही रह गएं। बाबूजी हाथ ऊपर कर बोल पड़े, " थ्री चियर्स फॉर यश! हिप..हिप..हुर्रेये !
यश को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें! उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि बाबू जी उसके लिए इतना महँगा तोहफ़ा लाएंगे।
बहुत से माता-पिता ख़ामोशी से अपने बच्चे की भलाई के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं और उन्हें भनक तक नहीं लगने देते। अक्सर अभिभावक बच्चों को पैसे कीमत समझाने के लिए, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए कठोर रुख अपनाते हैं लेकिन वह सब उनके अपने पंखों को मजबूत बनाने के लिए करते हैं ताकि जब भी वो नीले आकाश में उड़ान भरें, स्वयं के दम पर आकाश नाप सकें....
आखिर कौन नहीं चाहेगा कि उनकी औलाद में चुनौतियों से भीड़ने का जज़्बा कूट-कूट कर न भरा हो? क्योंकि सौभाग्य लक्ष्मी का वरण कर उसे ढ़ोल-नगाडों के साथ घर लाने के लिए फौलादी जिगरा चाहिए जी जिगरा ....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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