फिर वही सुबह फिर वही शाम

फिर वही सुबह और

फिर वही शाम

क्या है जीवन !

क्या है मृत्यु !

क्या है इसका

अंतिम मुकाम !


हंसते चेहरे

रोते चेहरे

कुछ गंभीर और

कुछ घनेरे 

कुछ उलझ गये

कुछ सुलझ गये

कुछ अधर में ही

झुलस गये

करते-करते ही आराम

फिर वही सुबह और

फिर वही शाम......


समय का पहिया

बढ़ता जाये

हर पल, पल-पल

चलता जाये

गुजरे दिन और

गुजरी रातें

बीते सावन

और बरसातें

न ही करता

है विश्राम

फिर वही सुबह और

फिर वही शाम......


गुजरे पल को

छोड़ कर

जीवन को कुछ

मोड़‌कर

आगे बढ़ तू

आगे चल

बदल दे तू

अपना वो कल

जिसके सपने देख रहा

जिसको तू है खोज रहा

जी ले जीवन

पा ले मृत्यु

यही है तेरा

अंतिम मुकाम

फिर वही सुबह और

फिर वहीं शाम.....



    द्वारा Kapil Tiwari
    Shared05 Sep 2025
    Start05 Sep 2025
    End05 Sep 2030
    इस पर लोग क्या कह रहे हैं
    • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
    • बहुत बढ़िया लिखा है।
    • अत्त्युत्तम सृजन। जय हो।