ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग 3
ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग 3

भाग ३

सुबह-सुबह ही मानों वैदेही को लॉटरी लग गई थी! डॉ साहिबा ने आते ही वैदेही से हाथ मिलाते हुए पूछ लिया, " वैदेही! मग कधी जायच घरी? " वैदेही मुस्कुराई...उसे लगा..वो मज़ाक कर रही है... वह पीठ थपथपा कर आगे बढ़ गई!
रोज वैदेही की माँ जिस बूढ़ी माई से नाश्ते का पैकेट खरीदती थी उसका वह इंतज़ार कर रही थी! उसकी इस उम्र में दौड़-धूप देख जानकी जी बहुत प्रभावित थी। उन्होंने घर से एक साड़ी लाई थी उसे देने के लिए! बुरे समय में उन्हें घर के जैसा नाश्ता-चाय उसी की वजह से प्राप्त हुआ था। हॉटेल की चीजें कभी कभार शौक से खाना अच्छा लगता है लेकिन मज़बूरी में खाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है यह वह जानती थी! तभी उसकी आवाज़ सुनाई दी! आज उसने साबूदाना खिचड़ी और सूजी का हलवा बना कर लाया था! वैदेही को हलवा बहुत पसंद था!  माँ ने दोनों चीजें खरीदी और उसे साड़ी भी दी! 
उसके आँखें कृतज्ञता से भर आई! जाते जाते दुआएं देती वह आगे बढ़ गई!
सुबह का नाश्ता, दवा-पानी सब हो चुका था.. तभी वज्र के पापा आएं..उनका चेहरा उतरा-उतरा सा था फिर भी वह बोल पड़ी, " नमस्ते आबा! कसा आहे वज्र?... आबा कुछ बोल नहीं पाएं और माँ को इशारे से बाहर बुला वो चले गए...उनका उदास चेहरा वैदेही को बहुत कुछ कह गया था!
थोड़े समय बाद लौटी माँ को देख उसकी शंका को और बल मिला..बार-बार वैदेही वज्र और विनय के बारे में पूछ रही थी और माँ टालमटोल कर रही थी....
अब वैदेही ज़िद पर अड़ गई... "माँ! क्या छुपा रही हो मुझ से? इतने घाँव सहे.. अब संवेदनाएं मर चुकी हैं माँ! बताओ न..माँ... प्लीज...कैसे भी कठोर सच का सामना करने की हिम्मत आ गई है मुझ में!
बेटा! वज्र का दिल बहुत मुश्किल से काम कर रहा हैं... आबा कह रहें थे... डॉक्टर कह रहें हैं...उसका हार्ट ट्रांसप्लांट करना पड़ेगा... और विनय... उसके माता-पिता दोनों आ चुके हैं पर.. उसके बचने की उम्मीद  बिल्कुल नहीं हैं..आज ही डॉक्टर ने उनसे बात की... वेंटीलेटर पर चल रही हैं उसकी साँसे!

माँ! भगवान अच्छे लोगों के साथ ऐसा क्यों करता हैं? खुद से ज्यादा विनय दूसरों का सोचता था... माता-पिता का एकलौता बेटा..क्या बीत रही होगी उनपर...डॉक्टर की बात सुनकर!

वैदेही मन ही मन कराह रही थी...आँखें बंद कर वह सो गई! अवचेतन मन के विस्तीर्ण पर्दे पर मानों अतीत की फ़िल्म चल रही थी! विनय का वो हंसमुख स्वभाव, दूसरों के विचारों को सम्मान देने का बड्डपन और सबसे महत्वपूर्ण..औरों के लिए जीने की चाहत.. कैसे भूल पाऊँगी मैं?
माँ अख़बार पढ़ रही थी तभी उसके मन में बिजली सा एक विचार कौन्ध गया! विनय वज्र को जीवन दान दे सकता हैं...  तभी दूसरे मन ने उसे धिक्कारा.. क्या सोचेंगे उसके माता-पिता..हम... नहीं...नहीं....वह किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी ही थी कि फ़ोन की घंटी बजी...आबा घर से कुछ लेकर आ रहें थे...वैदेही गहरी नींद में थी..
सामने फैले विशाल फलक की ऒर देखते हुए वह बोल पड़ी.. माँ! तुम्हें पता हैं..मैंने और विनय ने साथ में ही 'ऑर्गन डोनेशन' का फॉर्म भरा था...ऑनलाइन... किस लिए..पता है? हमारी इच्छा थी कि हमारे अंग किसी और के काम आ सकें! माँ! तुम जानती हो.. ब्रेन डेड व्यक्ति के कितने अंग दूसरे को जीवन दान दे सकते है! माँ! जरा सोचो... ये भावुक होने का समय नहीं हट कर सोचने का समय है माँ।
वो दुविधा में थी कि उसकी नज़र सीढ़ियों से आते आबा पर गई...उसका अन्तरमन उससे सवाल कर रहा था..
अगर वज्र के रूप में विनय जिन्दा रहता हैं... तो...  उसकी अंतिम इच्छा भी पूरी हो जाएगी और उसके ही खास दोस्त को नई ज़िन्दगी मिलेगी ....कैसे समझायेंगे उसके माता-पिता को...इस दुःख कि कठिन घड़ी में! लेकिन किसी ण किसी को तो यह काम करना होगा! एक ज़िन्दगी है जिसे हम लाख कोशिशों के बाद भी बचा नहीं सकते और दूसरी तरफ एक ज़िन्दगी है जिसे हम नई ज़िन्दगी दे सकते है। माँ! किसी को ज़िन्दगी का तोहफ़ा देना पुण्य का काम ही है न? जानकी दुविधा में थी! कैसे कहें यह बात...
आखिर उसने आबा को कह दिया, "आबा! वैदेही म्हणत होती... विनय आणि तिने अंगदान करण्यासाठी फॉर्म भरला होता ...मागच्या वर्षी...सुनते ही आबा की आँखें चमकने लगी.. "मी बोलतो डॉक्टरांशी.."
कह कर वह फुर्ती से सीढ़ियां उतरने लगे..
शाम को वैदेही की माँ नर्स को ध्यान रखने को कह कर विनय के माता-पिता को मिलने चली गई! आशा की एक चमकती किरण बादलों के बीच लुका-छुपी खेल रही थी!

कल की सुनामी का जोर अब थोड़ा शांत हो चूका था, तबाही का मंजर भले ही अंतर्मन पर गहरा अंकित हो चूका था और धीर-धीरे विनय के माता-पिता खुद को सँभालने की कोशिश करने लगे थे! एक तरफ डॉक्टर का सुझाव और दूसरी तरफ पुत्र से जुड़ाव... मन में रस्साकशी चल रही थी... माँ के आँसू सूख चुके थे... अब वह दोनों अपने घायल मन को भविष्य से आमना-सामना करने के लिए तैयार कर रहें थे..…अपना बेटा तो वे खो चुके थे लेकिन अगर दूसरे के रूप में वह जिन्दा रहेगा तो कोशिश करने में हर्ज क्या है? उनकी आँखें चमक उठी! बेटे की अंतिम इच्छा पूरी करने का दायित्व उन्ही पर तो था!
विभा के पिता उसे दिल्ली ले जाने की तैयारी कर रहें थे...वहाँ उनकी अच्छी खासी पहचान भी थी और डॉक्टर भी अनुभवी थे! चेहरे में जगह-जगह कांच के टुकड़े घुस जाने के कारण उसका चेहरा डरावना हो गया था... बाकी कसर आग की लपेटो ने पूरी कर दी थी! वैदेही की सब से सुन्दर, तेज-तर्रार सहेली थी वह।
वक़्त ने ऐसा दाँव खेला था कि पूरी चौसर ही बिखर गई थी... पता नहीं किसकी नज़र लग गई थी इन परिंदों को..
वक़्त के माँझे से उनका तन-मन छलनी हो गया था!
विभा के पिताजी चाहते थे कि जरा वो संभल जाएं तो फिर उसकी प्लास्टिक सर्जरी करा देंगे..अभी कुछ दिन वह इस माहौल से दूर रहेगी तो जल्दी ठीक हो जाएगी...तभी अचानक वैदेही एकदम उठ बैठी... न जाने उसने क्या देखा कि वह सर्द रात में पसीना-पसीना हो गई... मानों कोई उसे पुकार रहा है.. हाथ हिला कर अलविदा कह रहा हैं और वह बदहवास उसे पुकारती-पुकारती उसके पीछे-पीछे दौड़ी जा रही हैं..
वह जोर से चिल्लाई....माँ.. कहाँ हो माँ..देखो! वो जा रहा है.. इस दुनिया से दूर.. बहुत दूर....मुझें अकेला छोड़ कर... माँ...कहाँ हो माँ?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

शेष भाग अगले अंक में..


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