समय बड़ा बलवान, पल-पल है मूल्यवान।रोने-धोने में बीता दूं या करूँ मैं मंगल गान।
बीता पल न लौटेगा, क्यों याद करूँ जो खोया।
क्यों उलझूँ यहाँ-वहाँ, जब गर्भ में कल है सोया।
देव-गुरु-धर्म आशीष से, मनुज जन्म यह पाया।
जननी-जन्मभूमि ने प्यार से गोदी में हुलराया।
अंचरा के शामियानेतले लोरियाँ गा-गा सुलाया।
क्यों माटी-मोल करूँ माँ के सतत संघर्षो को।।
कठपुतली बन नाचू मैं रच्चनहारे के हाथों में।
भूल-भूलैय्या में भटकूँ या भ्रम के जंजालों में।
मुक्ति-मार्ग का पथिक बनूँ कामना है मन में।
कृपा दृष्टि रखना दाता कर्म-रज के बवंडर में।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।