जिन्हें हम भूलना चाहे....
 जिन्हें हम भूलना चाहे....


शीर्षक : जिन्हें हम भूलना चाहे....

क्या करें? चाह कर भी दिमाग़ शांत तो रहता नहीं! उलटे-पुलटे विचार दिमाग़ में ता-ता थैया करते रहते हैं! शूल सी चुभती जिन बातों को हम भूलना चाहते हैं वो अक्सर याद आती हैं! उनकी टीस हमें ताउम्र बेचैन करती रहती हैं! उम्र की ढलान पर जिन बातों को याद रखने की हम भरसक कोशिश करते हैं उन्हें बेशक़ हम भूल जाते हैं!
कुछ यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मस्तिष्क में सागर में उठती लहरों की तरह बार-बार दस्तक देती हैं, हमें बेचैन करती हैं! कितनी भी कोशिश करों.. उन्हें नज़रअंदाज करने की मगर वे जिद्दी बच्चें सी मार्ग में अवरोध बन कर खड़ी हो जाती हैं और आगे बढ़ने का रास्ता अवरुद्ध कर देती हैं! खुशियोंके हसीन लम्हें अगले ही दिन सुखी पंखुड़ियों से बिखर जाते हैं मगर वो दर्दनाक पल, जो हमें सिवा दर्द के कुछ नहीं दे पाते, दहकती अग्नि से पीड़ादाई होते हैं, वह बिना छुट्टी लिए दिन-रात काम करने वाले श्रमिकों की तरह मस्तिष्क में हाजरी लगाते हैं! चंचल मन ऐसे तो वानरों की तरह इस डाल से उस डाल उछलता रहता हैं पर दिल के किसी कोने में फेविकोल के जोड़ सा मजबूती से चिपक जाता हैं मानो हमें चुनौती दे रहा हो, "दिल से निकालना चाहती हो मुझे ? इतनी आसानी से निकाल नहीं पाओगी.."
वक़्त बेशक़ सारे घाँव भर देता हैं पर अपने निशान छोड़ जाता है! ये गहरे घाँव कभी नहीं मिटते! वो अपना अस्तित्व चीख-चीख कर जताते रहते हैं, दिल में खलबली मचाते रहते हैं!
फिर भी रच्चनहारे का हमें शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने हमें जीवन की सलेट पर लिखा मिटाने की क्षमता दी हैं वरना तो हम यादों के बवंडर में गोते खाते-खाते कब के रसातल में पहुँच गए होते!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

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