आज ज़रा सकुचाई ज़रा शरमाई सी मैं उनके पास गई..
आंखों में बेबाकी थी और दिल में उठे थे तूफान कई...
ठान लिया था आज कि उनके इकरार तो करना ही है...
चाहे हां कहें वो या ना पर मुझे इज़हार तो करना ही है...
जा कर कहा मैंने कि सुनो...
कुछ कहना है तुमसे... वक्त हो तुम्हारे पास तो बता सकती हूं क्या??
तुम पर अपना हक जता सकती हूं क्या??
कभी मौका मिले अपने दिल की बात कहने का.. तुम्हें अपने प्यार की इंतिहान बता सकती हूं क्या??
वादा कोई नहीं मांगूंगी तुमसे...पर तुम्हारे साथ अपनी तरफ से रिश्ता निभा सकती हूं क्या??
मैं तो तुम्हारी हो चुकी हूं पर तुम्हें अपना बना सकती हूं क्या??
तकदीर में तो शायद तुम नहीं हो मेरे.. पर तुम्हें अपने सपनों में सजा सकती हूं क्या??
शख्सियत यूं तो बहुत मामूली सी है मेरी...पर तुम्हारे दिल में समा सकती हूं क्या??
सुन कर मेरी बातें वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था...
कहनी उसे भी यहीं बात थी पर थोड़ा शरमा रहा था...
हाथ थामे वो बोला कि प्यार तो मैं भी तुमसे बहुत करता हूं...
जब तुमने ही बोल दी दिल की बातें सभी तो मैं भी ना किसी से डरता हूं...
तुम तो मेरे दिल में जाने कब से समाई हुई हो...
मुझे अपनी इन आंखों में जाने कब से रमाई हुई हो...
चलो एक वादा प्यार वाला हम एक दूजे से करते हैं...
इक दूजे से करते रहेंगे यूं ही प्यार जैसे अभी हम करते हैं..
जैसे अभी हम करते हैं..