कहाँ गए वो दिन....
कहाँ गए वो दिन....

कोराना घर में क्या घुसा, घर का ताना-बाना तोड़-मरोड़ गया!

पतिदेव ने ऑफिस जाना है छोड़ा, घर को ही ऑफिस बना के छोड़ा!

अब 'वर्क फ्रॉम होम' चलता है, बार-बार चाय का पतेला गैस पे चढ़ता है!

मैं ' कर्मचारी - बिनपगारी ', छुट्टी नहीं, 24/7 काम करो, बजाओ हाजरी!

कभी बारिश है, चाय-पकौड़ों की फरमाइश, कभी 'इंडिया' क्रिकेट मैच हारा, ला दो चाय की प्याली! कभी बॉस ने ऑनलाइन भेजी काम की फेहरिश्त,खाना खाने को कैसे मिले फुरसत?

यह वर्क फ्रॉम होम बड़ी बेदर्द, बेशर्म बला है, न शॉपिंग न छुट्टी की अर्जी चलती यहाँ हैं! छुट्टियों का करूँ तो करूँ क्या बहाना? दादी-नानी का अब कैसे करु झूठा उठामना?

"वर्क फ्रॉम होम" है जी...जी का जंजाल, न बीबी से 'टेम्पररी मुक्ति' न गुटखा-पान खाने का बिछा सकूँ जाल!

कहाँ गए वह दिन...AC ऑफिस के मजे , वो गर्लफ्रेंड संग बतियाने के लहजे? न बीबी-बच्चों की झिग-झिग, न पड़ोसियों की खीच-खीच! कहाँ गए वो ऑफिस के सुनहरे लम्हें, मधुरम दिन?

इस पर लोग क्या कह रहे हैं