23457024570modify युद्ध बनाम बर्बादी...खून खराबा संग सामुहिक ...विधा :काव्य बड़े आका बैठ बंकर में, युद्ध नीतियां गड़ते है ।अहंकार को पोषित करते, और परस्पर भिड़ते है ।।खून-खराबा संग सामुहिक, देखो जी कितना होता ।बर्बादी करते लोगों की,दुख संकट कितना ढोता।।सकल विश्व बारुद ढेरी पे,धूं-धूं कर सुलग रहा है।बंद करो ये खैल युद्ध का, कितना वो खून बहा है ।।करवाएं समझौता जाकर ,इस युद्ध को रूकवाओ।कोई मसिहा उतर बीच में ,थोड़ा उनको समझाओ।।ये युद्ध नहीं अहंकार है ऐसे नहीं युद्ध होतासीखें कोई भारत सेकभी नहीं आपा खोता।।शौर्य शांति का सुमेल साधा,कूटनिती देखी होगी।तभी उतरेंगे रण युद्ध में ,जब सख्त जरूरत होगी।।स्वरचित:अशोक दोशीLabelDirected by द्वारा अशोक दोषीShared23 Jun 2025Start23 Jun 2025End23 Jun 2030 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंAshish Jain26-Apr-2026CommentLikeबहुत सुन्दर कहानी! आगे जे वहाग का इंतज़ार रहेगा!🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏Hemant Jain20-Jun-2026CommentLikeवाह वाह! बहुत खूब! सुन्दर प्रस्तुति!Intranet Demo25-Jun-2026CommentLikeबहुत बढियाँ युद्ध बनाम बर्बादी...© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें