शीर्षक : आदित्य!
"आजी! लवकर ये! आई, बाबा दिसले मला टीवी वर” टीवी पर खबरें देखते देखते स्वाती जोर से चिल्लाई मानों उसने आकाश में नया तारा ढूंढ़ लिया हो! वह नाचने लगी मानों बारिश की फुहारों में मोर अपने सुंदर पंख फैला कर, कभी थरथरा कर, तो कभी झूम झूम कर, नृत्य कर रहा है!
पूजाघर में कान्हा को दो दिन से जल में खड़ा रख कर गायत्री मंत्र का अखंड पाठ कर रही मालती की सुस्ताई आँखें अचानक जुगनू सी चमक उठी! बिखरे बालों को संवार कर वह बोल पड़ी,” पोरी! माझा आदित्य च होता न तो?” आजी की बात खत्म होने के पहले ही स्वाती मालती को लिपट गई! “आजी! तू दिलेलं घड़याल होते की बाबांच्या हाथा मध्यें!”
तभी स्नेहा भी हाथ में मोबाइल लिए वहां पहुंच गई! मां को देखते ही स्वाती मां को गले मिल रोने लगी! तीन दिन से पिता की कोई खबर नहीं थी!
मां, बेटी और दादी, सभी का धैर्य अब टूटने की कगार पर था! “तौकते” तूफान को आकर तीन दिन हो चुके थे! समंदर में उठती ऊंची-ऊंची लहरों को देख स्नेहा की सांसें ऊपर नीचे हो रही थी! तेज बारिश में बदहवास झूलते नारियल के पेड़, तूफानी हवाओं का शोर और किनारों की ओर दौड़ती तेज रफ़्तार लहरों ने उसे मानों आशंकाओं के उफनते दरिया में फेंक दिया था! पगलाई सी डरावनी लहरें किनारों को चीरती मानसपटल पर जोर-जोर से टकराती और स्नेहा का सुख चैन चुरा समन्दर में लौट जाती!
मन के खेल ही निराले है! रोज सुकून देता, मन को आल्हादित करता मौजों का शोर आज विरह की अग्नि को भड़का रहा था! विरह वेदना असहनीय हो गई थी उसके लिए! खिड़की से आती तेज हवाएं ऐसे लग रही थी मानों चित्कार कर रही हो!
दो दिन उसे न खाने-पीने की चिंता थी, न उठने-बैठने की सुध! नींद ने तो मानों उससे मुंह ही मोड़ लिया था दो-तीन दिनों से!
ये कोई पहली बार नहीं था! भारतीय नेवी के ऑफिसर से शादी कर दस साल हो चुके थे उसे! लहरों की सवारी करना, महीनों परिवार से दूर रहना, तूफानों से दो-दो हाथ कर सुरक्षित किनारे पर लौटना रूटीन सा था आदि और स्नेहा के लिए! पर पता नहीं इस बार स्नेहा की दांई आंख क्यों बार-बार फड़क रही थी! आई (सासू मां) के कहने पर दो बार उसने पलकों पर कमर को लटकती लोहे चाबी घुमाई लेकिन पलकें थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी! क्या करे! जिसे चाहते बहुत है उसकी जुदाई पर मन के आकाश में आशंकाओं के बादल उमड़-घुमड़ कर इकट्ठे भी बहुत होते हैं, मानों आनेवाले तूफान की ओर इशारा कर रहे हो! मालती ने दो दिन से उपवास रक्खा हुआ था! हमेशा उपवास में साबूदाना खिचड़ी तथा फल खाने वाली आई ने सामने पड़ी तश्तरी को छुआ तक नहीं था! कान्हा से उसकी जोरदार जंग चल रही थी! पूजाघर की गैलरी को लगा शीशा धुंधला चुका था लेकिन कुर्सी पर बैठी मालती बार-बार शीशे को साफ कर समंदर को देखती, गुनगुनाती और फिर मंत्र पाठ में लग जाती! न खुद सो रही थी न उसके कान्हा को उसने झूले में सुलाया था!
दो दिन के जागरण से उसकी आँखें थक गई थी! जरा सी झपकी लगती और सपने में आदि की छवि देख वह तपाक से उठ खड़ी होती ! आँखों के सामने आदि की बचपन की शरारतें, मीठे-तोतले बोल और अलमारी में करीने से सजा कर रखी ट्रॉफिया , मेडल्स आ जाते और आंसू पलकों के बांध तोड़कर उन्मक्त लहरों की तरह बहने लगते! अतीत फिल्म की तरह सामने से गुज़र जाता और मन उद्विग्न हो कराह उठता!
कितने पापड़ बेले थे उसने लिज्जत की फैक्ट्री में सुबह चार बजे उठकर …जा जा कर! एक ही सपना था उसके बाबा का! मैं न जा सका भारतीय नेवी में ...लेकिन आदि को जरूर भेजुंगा मैं नेवी में...मातृभूमि की सेवा करने!
मालती पुरानी यादों की गलियों में बावरी सी भटक- भटक कर वर्तमान में लौट चुकी थी ! मालती का इकलौता बेटा और उसके जांबाज साथी तीन दिन से उफनते दरिया में डूबे जहाज में सवार लोगों को, नाविकों को बचाने में दिन-रात एक कर रहे थे! सायं-सायं करती रातें, लहरों का तांडव, पगलाया सा दरिया और बचाव कार्य में जुटा नेवी का जंगी जहाज़ 'आईएनएस रक्षक'!
मां की धड़कनें तेज हो चुकी थी! आंखों से ओझल बेटा, आँखों की पुतलियों से दूर हटने का नाम ही नहीं ले रहा था और तभी आई स्वाती की बादलों की गड़गड़ाहट सी आवाज़ ...मानों कहीं आकाशवाणी हुई हो!
मालती की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी! एक ओर बहु और दूसरी ओर नाती को थामे वह कान्हा के आगे दंडवत करने झुक गई! मालती ने पास रख्खी चांदी की कटोरी से घी उंडेल कर दीप जलाया, 'कान्हा' को पानी से निकाल कर पुन:ह झूले में सुलाया, महकते गुलाब के फूल चढ़ाए और तीनों मिल कर आरती उतारने लगी! आंखों से बहती जलधारा को किसी ने रोकने का अट्टहास नहीं किया….
काली घटाएं तितर-बितर चुकी थी और आसमान में “आदित्य” अपनी सौ टंच सोने की मुस्कान लिए होले-होले फलक पर अवतरित हो रहा था……
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |