विधा- कुंडलिया छंद
प्रदत्त चरण- दुनियादारी सीख लो
दुनियादारी सीख लो, मानस को झकझोर।
सदा तर्क की क्यों सुने, आतम थामो डोर।
आतम थामो डोर, मनुज कर नित प्रभु वंदन।
धन्यवाद दे नित्य, स्मरण रख कर अभिनन्दन।
कृपा-दृष्टि मम देव, लेख अतिशय कल्याणकारी।
मनुज जन्म का सार, जीव हित दुनियादारी।।
प्रदत्त चरण-वो क्या समझेंगे भला..
वो क्या समझेंगे भला, औरों के दिल पीड़।
जिनका दिल है खोखला, नहीं बनाते नीड।।
नहीं बनाते नीड, करें सब दुर्गम राहें।
अहम भाव को त्याग, खोलते हैं कब बाहें।
मनुज तोलते देख, कनक या नोटों से जो।
दीन-हीन की पीड़, भला समझेंगे क्या वो।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।