वज्र को देख यश अचंभित था। उसे लगा था कि इतनी रात गए ड्राइवर आयेगा गाड़ी लेकर लेकिन यश के आगमन पर एक विजेता की तरह स्वागत करना था वज्र को यश का तो फिर जिगरी दोस्त तो हाजिर रहेगा ही न एयरपोर्ट पर! सभी यश की जीवट, जिंदादिली और जुनून के आगे नतमस्तक थे।
कभी कभी सील में खयाल आता, अगर जीवन से हारने वाले, आत्महत्या को ही उलझनों को सुलझाने का उपाय समझने वाले एक बार भी यजैसे व्यक्ति से मिल-बैठ कर बातें करते, उसको अपना हाल-ये-दिल सुनाते तो अगले ही पल जीवन को ख़त्म करने के निर्णय पर जरूर पुनर्विचार करना शुरु कर देते, इतनी ऊर्जा से भरा हुआ था यश। उसे करीब से देख कर ही जीवन का मतलब हर किसी को समझ में आ जाता था!
जीते तो सभी है, कोई कीड़े-मकौड़ों की तरह तो कोई जंगल के सिंह की तरह! हर एक का जीने का अपना- अपना अंदाज होता है। यश अपनी ही मस्ती में झूमता, जहाँ जाता वहाँ हँसी बिखेरता। मन्दिर में चढ़ी प्रसादी की तरह वह मित्र-मण्डली, स्नेही जनों को पल भर के लिए ही सही लेकिन खुशियाँ बाँट आ जाता! वह हमेशा कहता गम बाँटने से दिल हल्का होता है लेकिन....
किसे फुर्सत यारों, आँसू गिनने की?
चन्द हसीन पल, बर्बाद करने की?
गम का भला कौन यहाँ साझेदार?
रिश्ते जहाँ तूलते पैसों से मेरे यार!
यश के आते ही महफ़िल में जान आ जाती थी। उसका स्वाभाव ही ऐसा था। पल दो पल में हर किसी को अपना बना देता था। उसके माता-पिता से कई दिनों तक उसकी मुलाक़ात नहीं होती। उसकी दुनिया उससे ही शुरु हो कर उसी तक ख़त्म हो जाती।
एक बंसी काका थे जिनकी जान उसमें अटकी रहती थी। वह रात-दिन इसकी चिंता में ही लगे रहते। उनका दिल न जाने क्यों अक्सर आशंकाओं से घिरा रहता। शायद अतीत की यादें उन्हें बेचैन करती थी। उम्र के ढलान पर यादों के कारवाँ बिन-बुलाएं मेहमान से आ कर दिमाग़ में घर कर बैठ जाते और फिर निकलने का नाम ही नहीं लेते। कितनी जद्दोजहद के बाद बंसी काका उनसे अपना पिंड छुड़ा पाते।
वज्र को हौले से गले मिल यश गाड़ी में बैठ गया। ड्राइवर गाड़ी की डिक्की में सामान रख कर गाड़ी दौडाने लगा। वज्र को वैसे तो जल्दी सोने की आदत थी लेकिन यश के लिए वह एयरपोर्ट जाने का मन बना चूका था। आखिर दिल की बात वह किसे बताता? तीन दिन का इंतज़ार उसे कई सदियों का इंतज़ार प्रतीत हो रहा था। आखिर गाड़ी के रफ़्तार पकड़ते ही वज्र बोल पड़ा! "यार! एक खुशखबरी है।" यश जोर से चिल्लाया, " अरे यार! जल्दी बोल! इतना इंतज़ार क्यों करा रहा है? वज्र बोल पड़ा, " यार! वैदेही और मेरी सगाई निश्चित हुई है और शादी के फेरें सब की परीक्षा के बाद!
यार यश! तेरा ही इंतज़ार कर रहा था खुशखबरी देने के लिए!"
यश ने खूब-खूब बधाईयाँ दी। वह बहुत खुश हुआ। मित्र- मण्डली में यह पहली सगाई होने वाली थी। यश का जन्मदिन भी था। वज्र ने छोटे से समारोह में सगाई की रस्म पूरी करने की बात कही तो यश ने उसका जोरदार अभिनंदन किया और कहा, " दोस्त! लोग सिर्फ समाज सुधार की बातें करते हैं लेकिन तुम दोनों उसे जीवन में उतार रहे हो! हमें तुम पर गर्व है यार!" यश को ताम-झाम, दिखावा, फिजूलखर्ची बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसने वज्र-वैदेही के निर्णय की तहेदिल से प्रशंशा की। रात के ढ़ाई बज चुके थे। यश को घर तक पहुंचा कर, उसका सामान रखवा कर वज्र अपने घर की ऒर लौटा..सुबह कॉलेज में मिलने का वादा कर।
यश घर पहुंचा तब तक बंसी काका जाग रहे थे। यश में ही उन्हें कोविड में खोया अपना जवान बेटा नज़र आता था! आखिर बेटा घर नहीं पहुँचता तब तक उन्हें कैसे नींद आती। पहले तो यश ने प्यार से डांटा, " काका! आप क्यों जाग रहे थे आधी रात तक? चाबी थी न मेरे पास! मैं संभाल लेता सब " वह भी जानता था कि जब तक वह घर नहीं पहुंचेगा, वो नहीं सोयेंगे!
उन्होंने यश को पानी का ग्लास भर कर दिया और चाय-कॉफी के लिए पूछा! यश ने उन्हें पानी की बोतल भर कर देने को कहा और फिर अपने कमरे में जाकर आराम से सो जाने को कहा! यश ने उन्हें अलार्म लगाने की याद दिलाई क्योंकि सबेरे कॉलेज जाना था।
ज़िन्दगी में ऊपरवाला कुछ ऐसे लोगों को भेज देता है हमारे करीब कि भले ही उनसे खून का कोई रिश्ता न हो लेकिन वो उन रिश्तों से भी ज्यादा शिद्दत से रिश्ते निभाते है। इनमें दिखावा नहीं दिल की चाहत होती है जो तमाम दूरियों के बावजूद भी नजदीकियाँ बन जाती है और जीवन को खुशनुमा बना देती है सुबह की सुनहरी धूप सी, खास कर तब जब हम ठण्ड में सिकुड़ कर बैठे होते हैं।
बंसी काका उम्र में भी बड़े थे और तजुर्बे में भी। ज़िन्दगी का खट्टा-मीठा स्वाद उन्होंने चखा था और इसलिए छोटी-छोटी खुशियों का मोल वह बखूबी जानते थे। यश के साथ रहने में उन्हें बहुत शान्ति तथा सुकून का अनुभव होता था। यश था भी वैसा ही! लक्ष्मी जी उन पर सुवर्ण मुद्राओं से भरा कलश उंडेल रही थी, सरस्वती जी जिव्हा पर विराजमान थी, घर कुबेर का भंडार था फिर भी यश के चेहरे पर कभी अहंकार का भाव नज़र नहीं आता था ।
एक ही खोट थी उसमें इस कलियुग में! मुँह पर ही सच बोल देना, आमने-सामने ही खरी-खरी सुना देना! अब कलियुग में सच बोलना जहाँ हिम्मत काम है वहाँ सच सुनना तो उससे भी बड़ा जटिल काम है। जब तक आप सामने वाले के सम्मान में कशीदे पढ़ रहे हो, आपके जैसा सद पुरुष या स्त्री कोई नहीं। जैसे ही आपने हकीकत की परतें खोलना शुरु किया, दोस्त दुश्मन में बदल जाते है, प्यार करने वाले तिरस्कार करने लगते है। आजकल सच कहने-सुनने के लिए चट्टान सा जिगर, फौलाद सा हौसला चाहिए तो उसे बर्दाश्त करने के लिए माँ का ममतामई, क्षमाशील कलेजा चाहिए। यश की यही नेकनियती उसे बहुत बार मुश्किल में डाल देती थी। न वो खुद को बदल सकता था न जमाना अपने-आप को!
आधी रात हो चुकी थी। झींगुरों की आवाज़ रात के सन्नाटे को बार-बार चीर कर आगे निकल रही थी। यश को निंदियाँ रानी ने अपने आगोश में ले लिया था। अवचेतन मन में सपनों को अग्निपँख लग गएं थे। माँ भारती उसे अपने शामियाने तले विश्राम करने बुला रही थी। सपने चेतना को झकझोर रहे थे। नई उड़ान भरने के लिए उसे प्रोत्साहित कर रहे थे और दूसरी तरफ चन्द्रमा उस पर मुस्कुरा रहा था। चांदनी सागर से लिपट कर सो चुकी थी और चाँद पहरदारी करत-करते थक कर चूर हो गया था। बार-बार प्राची की ऒर मुख कर उसे उकसा रहा था। भोर की आहट का इन्तजार था। फागुन ने दस्तक दे दी थी लेकिन भोर अपने उतावलेपन से सब को परेशान कर रही थी। पवन के मंद-मंद झोंके उसके गालों को सहला रहे थे और ख़ग गण भी भोर के स्वागत में विविध रूपी आकर्षक साज पर अलग-अलग राग छेड़ रहे थे।
यश सपनों की दुनिया में खो चूका था... अजनबी सा...एक ही लक्ष्य का पीछा करते-करते...पार्थ की सी एकाग्रता लिए..मत्स्य-नयन पर नजरें गढाएं...सन्धान को सुसज्ज..तत्पर...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में.