भाग ८४
सुबह-सुबह लाली, अप्पा और दगड़ा बाई कराड के लिए रवाना हो चुके थे। लाली को रास्ते में तकलीफ न हो इसलिए गाड़ी तीन जगह ठहर कर आगे बढ़ने वाली थी। खालापुर आते ही सभी कुछ समय के लिए रुके। लाली, दगड़ा बाई वॉशरूम हो कर आई और अप्पा भी कुछ फ्रेश होकर आएं। सभी ने वहाँ मसाला वाली स्पेशल चाय पी। लाली के लिए थोड़ा दूध भी मंगवा दिया था अप्पा यशवंत राव जी ने। अब घाट शुरु होने वाला था। अप्पा ने लाली को कुछ समय आराम करने को कहा। सुबह की दवाईयाँ लेकर वैसे भी लाली को नींद आ रही थी। वह दगड़ा बाई के गोदी में सिर रख कर सो गई। अप्पा आगे की सीट पर बैठ कर घाट की प्राकृतिक सुंदरता का आनन्द ले रहे थे।
अब अंधेरों को ठेंगा दिखा कर सूरज की रोशनी दिखाई देने लगी थी। वो कुछ ही समय में लोनावला से आगे निकल चुके थे। अब दूसरा घाट लगने वाला था। आबा ने लाली की ऒर देखा। वह चैन से सो रही थी। अपनी सभी उलझने अप्पा के कन्धे पर डाल वह मानों निश्चिन्त हो गई थी। दगड़ा बाई का पैर अब कुछ-कुछ सुन्न होने लगा था। उन्होंने हौले से अपनी कपडे की थैली लाली के सिर के नीचे रख दी और खुद उसके भाल पर थपथपाने लगी। सुबह जल्दी उठकर सारा काम निपट कर आने के चक्कर में वह भी थक गई थी उसने अप्पा को कुछ खाने को परोसु क्या? कर के पूछा और उनके ना कहने पर वह भी बैठे-बैठे नींद की झपकीयां लेने लगी।
दगड़ा बाई के लिए उम्मीदों की किरण लाली ही थी। उन्होंने उसे बचपन से ही काम करने की आदत डाल दी थी। अपनी मजबूरियों की वजह से वह उसे स्कूल न भेज सक़ी लेकिन यह कमी विभा ने उसे घर में सीखा कर पूरी कर दी थी। वैसे तो तेजतर्रार थी लाली। डर इसके आसपास भी नहीं फटकता था लेकिन दिल की सीधी, सरल, भोली! न शहर की चलाखी न दो-मुंहापन! दिल मानों खुली किताब।
यहीं वह मार खा गई थी। शहर की भोर इसे रास नहीं आई थी। वह शहर में रहना चाहती थी लेकिन उसकी मूर्खता ने ही सारे दरवाजे बन्द कर दिए थे। अब तक दूसरा घाट भी पार हो चूका था। अप्पा ने एक पेड़ के नीचे गाड़ी रुकवाई। गाड़ी से चटाई, फोल्डिंग दो कुसियाँ निकलवाई और खुद बैठे और लाली को दूसरी कुर्सी पर बैठा कर दगड़ा बाई को सब को खाना परोसने को कहा। ड्राइवर को भी साथ में ही भोजन करने को कहा। लाली के लिए आज दगड़ा बाई ने उपमा बना के लाया था। उसे खाने को दे कर तीनों ने भोजन शुरु किया।
अप्पा ऊंच-नीच, अमीर-गरीब का भेद नहीं मानते थे। गुरूद्वारे के लंगर की तरह उनके यहाँ भी सब साथ में ही खाना खाते थे। खाना सब के लिए एक सा बनता था। सभी ने मसाला भात, पुरण पोळी का लुफ्त उठाया और पानी पीकर, थोड़ा इधर-उधर टहल कर सब वापस गाड़ी में बैठ गएं।
गाड़ी ने अब रफ़्तार पकड़ ली थी। रास्ते के दोनों ऒर हरे- भरे खेत, पीपल, बरगद, नीम के पुराने पेड़ उनसे बातें करने के लिए उतावले थे। बिच-बिच में सहजन की फल्लीयाँ उनका दिल से स्वागत कर रही थी। कहीं जवार तो कहीं गन्ना, कहीं मूंगफली तो कहीं मुंग-हरभरा। खेतों में रौनक थी। परिंदे जवार की बालियों पर डोल रहे थे। सूरज भी अब धरती के सिर पर खड़ा था।
अब गाड़ी कराड के कृष्णा-कोयना के पुल पर पहुँच चुकी थी। दोनों ऒर सूरज की रश्मियाँ नदी की धारा से गलबहियां डाल कर मुस्कुरा रही थी मानों बरसों बाद दोनों सखियां मिली हो। कुछ ही पलों में गाड़ी अप्पा की हवेली के आगे रुक गई। अप्पा के उतरते ही दगड़ा बाई ने लाली को इशारा किया और दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर घर के बरामदे की ऒर बढ़ने लगी। अप्पा को देख पद्मावती जी आगे बढ़ी। उन्होंने उन्हें खांट पर बैठा कर हाथ में ठन्डे पानी से भरा पीतल का लोटा थमाया और दगड़ा बाई को और लाली को हाथ-मुँह धोकर आने को कहा।
अप्पा थक चुके थे। उम्र की षष्ठी पार कर चुके अप्पा अब थोड़े-थोड़े झुकने लगे थे कमर से लेकिन रीढ़ की हड्डी अभी भी वैसी हो मजबूत थी जैसी पहले थी। आखिर गाँव की खुली हवा, शुद्ध पानी और जैविक अनाज का असर तो होगा ही न!
पद्मावती जी ने खाने के लिए पूछा तो दगड़ा बाई ने कहा कि सब ने खाना खा लिया हैं और जो भी खाने का सामान था वो रसोई में रख दिया। अप्पा को अन्न की बर्बादी बिल्कुल पसंद नहीं थी। अगर खाना बचा हैं तो उसे अच्छी स्थिति में ही दूसरे जरुरतमंदों को दे दिया जाय यहीं अप्पा का सबको आदेश था।
पद्मावती जी ने लाली को कमरे के अंदर ले जाने को कहा। पद्मावती जी ने चाय तो खुद ही बनाने की बात कहीं और दगड़ा को भी थोड़ी देर आराम कर फिर रसोई में आने के लिए कहा।
अप्पा का लाली को सुरक्षित करने का मिशन पूरा हो चूका था। उन्होंने विभा को फ़ोन कर कराड पहुँचने की ख़बर दी तथा उसे खुद का ध्यान रखने की, खुद को सँभालने की बात भी कहीं। उन्हें विभा का प्रश्न बार-बार झकझोर रहा था।
"अप्पा! अपराधी खुले आम घूम रहा हैं और पीड़िता डर कर घर में सिमट कर बैठी है! क्यों?"
"अगर मेरे जैसा व्यक्ति जिसकी ऊपर तक पहुँच है, वह पीड़िता को न्याय नहीं दिला सकता तो आम इन्सान की क्या औकात?" वह मन ही मन खुद को धिक्कार रहे थे। उनकी अपनी बेटी अभी भी वहीं थी। हर निर्णय के सिर्फ सिक्के से दो पहलू ही नहीं होते ज़िन्दगी में! हर कोन से सोच-समझ कर निर्णय लेना ही समझदारी है! अप्पा का मन नहीं मान रहा था फिर भी वे खुद को समझा रहे थे।
उन्होंने अब वज्र और वैदेही के इर्द गिर्द विभा के रहने का इंतज़ाम करने की ठानी थी। उसकी परीक्षा होने तक अप्पा और पद्मावती जी दोनों में से कोई न कोई उसके साथ रहेगा यह निर्णय अप्पा ने ले लिया था भले ही उनकी बेटी खुद को 'झाँसी की रानी' क्यों न समझती हो।
आज द्वितीय चयन स्पर्धा से पहले यश का नितीन सर के साथ मुलाक़ात का आख़री अवसर था। बाद में अगर चयन हो गया तो उसे तीसरी और अन्तिम कसौटी पर खरा उतरना था।
विभा, वीणा और यश सही समय पर बैडमिंटन कोर्ट पर पहुँच गए थे। ज्यादातर प्रैक्टिस विभा और वीणा की ही जारी थी। उन्हें अपने खेल में बहुत कुछ सुधार करने की जरुरत थी। नेट पर खेलने में वीणा अभी कमजोर थी और इस कमजोरी को दूर किए बिना मैच जितने की संभावना बढ़ नहीं सकती थी। उसे नितीन सर नेट पर खेलने की ही ज्यादा प्रैक्टिस दे रहे थे। विभा बाएं हाथ की ऒर आने वाले शॉट को उठाने में अभी भी चूक रही थी। राष्ट्रीय स्तर पर कमजोरियों को दूर किए बिना जीत की उम्मीद करना बेमानी था। नितीन सर एक तरफ और विभा और वीणा एक तरफ। उनकी कोर्ट के चारों दिशाओं में की गई प्लेसिंग ने दोनों को जबरदस्त थका दिया था। उन्हें अपने स्टेमिना को बढ़ाने पर भी काम करना था। अक्सर खिलाडी दो गेम तो पूरे दमखम से खेल लेता है लेकिन तीसरे गेम में हालत पतली हो जाती है। यहाँ जिसका दमखम अच्छा है वहीं गेम जीत कर मैच को अपने पक्ष में कर देता है। नितीन सर इन्हीं कमजोरियों पर ध्यान दिला कर उन्हें सुधारने की कोशिश कर रहे थे।
नितीन सर यश को थकाना नहीं चाहते थे। उसकी आज रात बारा-पच्चीस की फ्लाइट थी। वज्र और उसका ड्राइवर यश के साथ गाड़ी लेकर जाने वाला था। विभा, वैदेही का बहुत मन था लेकिन वज्र ने सब को ना कह दिया था।
दस बजे जानकी जी तथा आजी का आशीर्वाद ले कर यश वज्र के साथ निकल चूका था एयरपोर्ट के लिए। उसकी अपने पिताजी और माताजी से भी बात हो गई थी। उनकी दुआएं भी उसके साथ थी। यश ने लखनऊ में
गौरव सर से बात कर ली थी। अकादमी की गाड़ी उसे सही समय पर लेने वहाँ पहुँचने वाली थी। उज्जवल भविष्य की भोर का सबको इंतज़ार था और यश को देश की सेवा करने के लिए एक अदना से मौके का!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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