रेशम के धागे में लिपटी दुआओं की बात,
बहन की कलाई पर सजता है प्यार का सौगात।
ना सिर्फ एक रिवाज़, ना कोई रस्म पुरानी,
ये है रिश्तों की मिठास, ये है भावनाओं की कहानी।
हर राखी में छिपे होते हैं बचपन के पल,
झगड़े, हँसी, रूठना-मनाना और वो टिफ़िन के दल।
जब बहन कहती थी – "भैया, मेरी गुड़िया तू ले आना",
और भाई मुस्कुराकर कहता – "तेरे लिए तो चाँद भी ला पाऊँ ना!"
वो दिन जब कलाई पर राखी बंधी थी पहली बार,
माँ की आँखों में था गर्व, और पापा का स्नेह अपार।
तब से अब तक बदल गया बहुत कुछ जहाँ में,
पर वो धागा अब भी वही है – प्रेम की पहचान में।
कभी बहन बन जाती है ढाल समय की मार से,
कभी भाई बना रहता है परछाई हर खतरे की धार से।
रिश्ता ये राखी का – अनमोल, अटूट, सदा रहे,
हर मोड़ पर, हर हाल में, ये रिश्ता यूँही खिला रहे।