23610526105modify उत्सव!लम्हा-लम्हा जिंदगी,हथेलियों में समेट,खिलखिलाया किजिए!बेवजह गिले-शिकवे,रुठने-मनाने में,गंवाया न किजिए!देहरी पे जलते,अदना से दीये को,अनदेखा न किजिए!प्यार के लफ़्ज़ों को,धागे में पिरो कर,फिज़ा महका दिजिए!जिंदगी का जाम,जहर या अमिरस,'चियर्स' कर पीजिए!जिंदगी धूप-छांव,जीवट, जिजीविषा से,सार्थक बना लिजिए!समय की गुस्ताखियों से,सबक ले, फौलाद बन, शिखर सर किजिए!चिंतामणी सी जिंदगी,सहस्त्रफणी से पा कर,मनुष्य भव सुधारिए!जिंदगी के महाकाव्य को,अनुभव का संबल दे,कार्य शाला बनाइए!आए है दुनिया में तो,वक़्त की रेत पर,नाम लिख जाइएं!जीवन सुवर्ण कलश में,रजत मुद्राएं भर लाइएं! जीवन में अमृत घोल,स्नेहीजनों संग उत्सव मनाइएं!LabelDirected by द्वारा कुसुम सुराणाShared13 Feb 2025Start13 Feb 2025End13 Feb 2030 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंTanu Jain21-May-2025CommentLikeबहुत सुन्दर पंक्तियाँ! बधाई! Khushi Jain17-Jun-2025CommentLikeबहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई Sachin Jain08-Dec-2025CommentLikeखूबसूरत प्रस्तुति उत्सव!© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें