26822682modify शिशु!माँ के हाथ का झुनझुना,शिशु को कहाँ लुभाता है?ग्याझेट्स का रंगीन जमाना,लाडले को बहु भाता है।सुन मोबाइल की घंटी,नव-पल्लव खिल जाता है।बिखेर हँसी खूब बंटी,खींच मोबाइल ले आता है।।माँ के हाथ का मिष्टी दोना,भरा-भरा रह जाता है।मोबाइल नहीं भोजन संग,मुन्ना बगावत पें उतरता है।।खतरनाक किरणों से,डर कहाँ लगता शिशु को?अनजाने में भोला बालक,घबराता नित अँधियारा से।।खेल-खिलौने बेशक़,शिशु की सुन्दर सी दुनिया।लौरियाँ सुन सोने के विपरीत,मोबाइल के लिए रोता है।।छीना-झपटी में नौनिहाल,भूल गया मासूम बचपन।वक़्त से पहले ही किसलय,भूला देखो अब लड़कपन।।स्वरचित तथा मौलिक,कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।LabelDirected by द्वारा कुसुम सुराणाShared14 May 2026Start14 May 2026End14 May 2027 The Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैंटिप्पणी लिखेंशिशु!© टिप्पणी400 characters remainingजमा करेंरद्द करें