धारावाहिक

भाग ९१गुलमोहर की छाँव में सभी चबूतरे पर बैठे हुएं थे। गर्म हवाएं बह रही थी। सुबह के साढ़े दस बजे भी उनकी तपन महसूस हो रही था। गुलमोहर भी खामोश खड़ा था। न फूलों की बरसात न पत्तों की हलचल! पंछी भी डाल से ...
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भाग 90वज्र को देख यश अचंभित था। उसे लगा था कि इतनी रात गए ड्राइवर आयेगा गाड़ी लेकर लेकिन यश के आगमन पर एक विजेता की तरह स्वागत करना था वज्र को यश का तो फिर जिगरी दोस्त तो हाजिर रहेगा ही न एयरपोर्ट पर! ...
भाग 89यश का आज अंतिम मैच था। इसका प्रदर्शन अच्छा होना बहुत जरुरी था ताकि अंक तालिका में वह अव्वल रहे। आज गौरव सर ने सबको आमंत्रित किया था सुबह कोर्ट पर। 'हर कोई चाहता था एक मुट्ठी आसमान! ' लेकिन किसी ...
भाग ८८यश की द्वितीय चयन प्रक्रिया के मैच शुरु हो चुके थे। देश के कोने-कोने से आएं खिलाडियों में स्पर्धा थी। इस स्तर पर खेलने का मतलब था काबिल खिलाड़ियों में अपने आप को बेहतर साबित करना। आज यश जी-जान से...
भाग ८७आबा और प्रतिभा जी के पहुँचते ही आजी की आँखें चमकने लगी। वज्र भी घर पर ही था। भोजन वगैरा निपट कर आबा आराम कर रहे थे और प्रतिभा जी अपनी बैग से खाने-पीने का सामान निकाल रही थी कि आजी ने ...
भाग ८६लाली की तबियत में अब कुछ-कुछ सुधार नज़र आ रहा था। दगड़ा बाई का कलेजा मुँह में आ गया था परसो अपनी एकलौती बेटी का हाल देख कर। आखिर इतना ज़िन्दगी से संघर्ष किस लिए था? अपनी बेटी का भविष्य उज्जवल हो इस...
भाग ८५आजी की बातें जानकी जी के मन में तांडव कर रही थी। 'पोरी चं लग्न कधी करतेस? काखेला कळसा अन गावाला वळसा?' सामान्य परिस्थिति में वज्र का रिश्ता आता तो क्या जानकी जी इतना सोचती? लेकिन अब.. हार्ट ट्रा...
भाग ८४सुबह-सुबह लाली, अप्पा और दगड़ा बाई कराड के लिए रवाना हो चुके थे। लाली को रास्ते में तकलीफ न हो इसलिए गाड़ी तीन जगह ठहर कर आगे बढ़ने वाली थी। खालापुर आते ही सभी कुछ समय के लिए रुके। लाली, दगड़ा बाई व...
भाग ८३विभा के मानस पटल से उस नव-विवाहिता का जला हुआ चेहरा जा ही नहीं रहा था। न जाने कितने सवाल उसके मन के दरया में हुलारें मार रहे थे। बार-बार लहरों से उठे प्रश्न किनारे पे आ कर, सिर टकरा कर वाप...
भाग ८२ विभा और जानकी जी लाली के साथ समय पर डाक्टर के यहाँ पहूँच गई थी। जाते-जाते वैदेही को जानकी जी आजी के यहाँ छोड़ गई थी क्योंकि उन्हें कुछ ज्यादा वक़्त भी लग सकता था। वैदेही इकोनॉमिक्स की किताब ...
भाग ८१भोर ने चाँद-सितारों से सजी काली रजाई फेंक दी और मिचमिची आँखों से प्राची की ऒर देखने लगी। बार-बार उसने पलके झपकी। प्राची के उस पर गेंदे की पंखुड़ियाँ उछालते ही भोर खिलखिला कर कहकहें लगाने लगी। उनक...
भाग ८०अप्पा ने डॉक्टर से बात की और कल की अपॉइंटमेंट जो पहले से ही निश्चित थी उसे फिर एक बार मंजूरी दे दी। विभा कॉलेज जा चुकी थी। अप्पा और लाली ही घर में थे। लाली डर-डर कर काम कर रही थी। कभी उसके हाथ स...
भाग ७९सूरज पश्चिम की ऒर सरकने लगा था मानों कान्हा को देख राधा की वक्ष से ढलती चुनर। आसमान कुछ पलों के लिए क्रोध से लालम-लाल हो गया लेकिन धीरे-धीरे चिंता महाठगनी के आँचल के भीतर छुपने लगा। प्रकृति उसकी...
भाग ७८शाम होते-होते आजी के दो बार फ़ोन आ गएं थे। वज्र ने विभा और यश को भी खाने के लिए रुकने को कहा लेकिन उन्हें प्रैक्टिस के किए जाना था। यश ने विभा को उसके लैपटॉप में अकाउंटिंग के लिए 'झोहो' (Zoho) सॉ...
भाग ७७आबा के सासवड जाने के बाद वैदेही की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई थी। भले ही वह तीन दिन घर से काम करती थी लेकिन 'वज्र एक्सपोर्ट हाउस' का कामकाज देश-विदेश में फैला हुआ था। सभी मूल्यवान ग्राहकों कों सही त...
भाग ७६वज्र के दादाजी भास्कर राव जी का देहांत क्या हुआ आबा की सारी बिछी-बिछाई व्यापार की चौपट बिखर गई थी। अब तक भास्कर राव जी गाँव का सारा कारोबार सँभालते थे तो आबा को वहाँ की बिल्कुल चिंता नहीं थी। प्...
भाग ७५ज्वालामुखी के भीतर उबलते लावा सा विभा के दिल के अंदर क्रोध उबल रहा था। पीड़िता मानसिक और शारीरिक संत्रास भुगत रही थी और अपराधी खुलेआम घूम रहा था। बेचता तो वह फूल था लेकिन अपने स्वार्थ के लिए, अपन...
भाग ७४विभा द्वन्द में फंस गई थी। एक तरफ न्याय की गुहार लगाने की मंशा तो दूसरी तरफ एक नाबालिग कमसिन कली का भविष्य जिसने अभी-अभी सूर्यकिरणों के दर्शन कर अपनी नन्ही-नन्ही आँखें खोली थी दुनिया को अपलक निह...